बुरहानपुर जिले के नेपानगर क्षेत्र के आदिवासी ग्राम बाकड़ी में शिक्षा व्यवस्था की कमी का गंभीर असर बेटियों के भविष्य पर पड़ रहा है। गांव में हाईस्कूल नहीं होने और दूर स्थित स्कूल तक पहुंचने के लिए जंगल के रास्ते से गुजरने की मजबूरी के कारण कई छात्राएं आठवीं कक्षा के बाद पढ़ाई छोड़ने को मजबूर हैं।
गांव में माध्यमिक शिक्षा के बाद आगे की पढ़ाई के लिए कोई व्यवस्था नहीं है। छात्राओं को करीब 12 किलोमीटर दूर स्कूल जाना पड़ता है, जहां पहुंचने का रास्ता जंगल से होकर गुजरता है। सुरक्षा की चिंता के चलते कई अभिभावक अपनी बेटियों को आगे पढ़ने के लिए भेजने से हिचकते हैं।
ग्रामीणों के अनुसार, पिछले कई वर्षों से हाईस्कूल की मांग की जा रही है, लेकिन अब तक समस्या का समाधान नहीं हो पाया है। इसका नतीजा यह है कि कई आदिवासी बेटियां आठवीं के बाद शिक्षा छोड़ देती हैं। कुछ मामलों में कम उम्र में विवाह जैसी सामाजिक समस्याएं भी सामने आई हैं। इस वर्ष गांव में आठवीं कक्षा पास करने वाले 34 विद्यार्थियों में से केवल 8 लड़कों ने नौवीं में प्रवेश लिया, जबकि एक भी छात्रा आगे की पढ़ाई जारी नहीं रख सकी।
ग्रामीण अभिभावकों अखन्द सिंह, शंकर मेहता और जगन्नाथ सिंह का कहना है कि जंगल के रास्ते से इतनी दूर बेटियों को अकेले भेजना सुरक्षित नहीं है। वे चाहते हैं कि गांव में ही हाईस्कूल की सुविधा शुरू हो, जिससे बेटियां बिना किसी डर के अपनी पढ़ाई जारी रख सकें।

भातखेड़ा के जन शिक्षक राजेश कापड़े ने बताया कि हाईस्कूल खोलने के लिए कई बार प्रस्ताव भेजे गए हैं। स्कूल निर्माण के लिए जमीन चिन्हित करने और सर्वे जैसी प्रक्रियाएं भी पूरी की जा चुकी हैं, लेकिन अभी तक स्कूल शुरू नहीं हो सका है। मामला सामने आने के बाद विभाग ने एक बार फिर प्रस्ताव भेजने की बात कही है।
आदिम जाति विभाग के जिला संयोजक भरत राजपुरे ने बताया कि हाईस्कूल के लिए प्रस्ताव शासन स्तर पर भेजे गए हैं। स्वीकृति मिलने के बाद स्कूल निर्माण की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाएगी।
बाकड़ी गांव की बेटियां आज भी केवल एक हाईस्कूल की कमी के कारण अपने सपनों से दूर हो रही हैं। ग्रामीणों को उम्मीद है कि विभागीय पहल जल्द जमीन पर दिखाई देगी और गांव की बेटियों को अपने ही क्षेत्र में आगे की शिक्षा प्राप्त करने का अवसर मिलेगा।