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राज्यसभा में फर्जी जाति प्रमाण पत्रों पर डॉ. सुमेर सिंह सोलंकी ने जताई गहरी चिंता, देशव्यापी सख्त कार्रवाई की मांग

डॉ. सोलंकी ने कहा कि संविधान द्वारा सामाजिक न्याय और समान अवसर सुनिश्चित करने के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गई है, लेकिन कुछ स्वार्थी तत्व फर्जी जाति प्रमाण पत्र बनवाकर इस व्यवस्था को कमजोर कर रहे हैं।

By: Abhinav Tiwari 
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राज्यसभा में फर्जी जाति प्रमाण पत्रों पर डॉ. सुमेर सिंह सोलंकी ने जताई गहरी चिंता, देशव्यापी सख्त कार्रवाई की मांग

राज्यसभा में शून्यकाल के दौरान मध्यप्रदेश से भाजपा के राज्यसभा सांसद डॉ. सुमेर सिंह सोलंकी ने अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) समुदायों के नाम पर बनाए जा रहे फर्जी जाति प्रमाण पत्रों की बढ़ती समस्या को अत्यंत गंभीर बताते हुए सदन का ध्यान आकृष्ट किया। उन्होंने कहा कि जाली प्रमाण पत्रों के जरिए आदिवासी समाज के वास्तविक हक और अधिकारों का लंबे समय से हनन हो रहा है, जो अब चिंताजनक स्तर तक पहुंच चुका है।

आरक्षण के उद्देश्य पर पड़ रहा प्रतिकूल प्रभाव

डॉ. सोलंकी ने कहा कि संविधान द्वारा सामाजिक न्याय और समान अवसर सुनिश्चित करने के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गई है, लेकिन कुछ स्वार्थी तत्व फर्जी जाति प्रमाण पत्र बनवाकर इस व्यवस्था को कमजोर कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि सरकारी जांच समितियों और राज्य स्तरीय सत्यापन प्राधिकरणों ने कई राज्यों में बड़ी संख्या में प्रमाण पत्रों को जाली पाया है। शिक्षा से लेकर सरकारी सेवाओं तक आरक्षित सीटों और पदों पर नकली दावेदारों के काबिज होने की घटनाएं सामने आती रही हैं।

हकदारों के भविष्य पर सीधा प्रहार

उन्होंने स्पष्ट किया कि इसका सबसे बड़ा नुकसान उन गरीब और योग्य छात्रों को होता है, जिनके लिए आरक्षण बनाया गया है। जब कोई फर्जी व्यक्ति आरक्षित सीट या नौकरी प्राप्त करता है, तो वह न केवल नियमों का उल्लंघन करता है, बल्कि किसी हकदार का भविष्य भी छीन लेता है। कई मामलों में फर्जीवाड़ा पकड़े जाने के बावजूद कार्रवाई में देरी होती है और दोषी वर्षों तक पद व वेतन का लाभ उठाते रहते हैं-जो संवैधानिक मूल्यों के विपरीत है।

मध्यप्रदेश की स्थिति पर विशेष चिंता

अपने गृहप्रदेश का उल्लेख करते हुए डॉ. सोलंकी ने बताया कि विधानसभा में दी गई जानकारी के अनुसार जाली प्रमाण पत्रों के जरिए नौकरी पाने के 232 मामलों की जांच चल रही है। वहीं, 20 वर्षों से अधिक समय से 8000 से ज्यादा फर्जी जाति प्रमाण पत्रों के मामले छानबीन समिति के पास लंबित हैं। उन्होंने कहा कि यह स्थिति SC-ST समाज के लिए गहरी चिंता का विषय है और इसे लेकर समाज में रोष भी देखा गया है।

सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी का हवाला

डॉ. सोलंकी ने सुप्रीम कोर्ट की स्पष्ट टिप्पणी का उल्लेख करते हुए कहा कि फर्जी जाति प्रमाण पत्र के आधार पर प्राप्त नौकरी या शैक्षणिक प्रवेश मान्य नहीं माना जाएगा और ऐसे मामलों में दोषियों पर कड़ी कानूनी कार्रवाई तथा सेवा से बर्खास्तगी अनिवार्य होनी चाहिए।

देशव्यापी समस्या, सख्त सत्यापन तंत्र की जरूरत

उन्होंने सदन को अवगत कराया कि मध्यप्रदेश, राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, ओडिशा, झारखंड, उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, उत्तराखंड और दिल्ली सहित कई राज्यों में ऐसे मामलों की संख्या लगातार सामने आ रही है, जो पूरे देश के लिए चिंता का विषय है। डॉ. सोलंकी ने सरकार से आग्रह किया कि पूरे देश में प्रभावी और कड़ाई से लागू होने वाली जाति प्रमाण पत्र सत्यापन व्यवस्था सुनिश्चित की जाए और दोषियों पर कठोर कार्रवाई हो।

संवैधानिक अधिकार की रक्षा का आह्वान

अपने वक्तव्य के अंत में उन्होंने कहा कि आरक्षण कोई कृपा नहीं, बल्कि संवैधानिक अधिकार है, और इस अधिकार की रक्षा करना हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है। उन्होंने जोर देकर कहा कि आरक्षण का लाभ केवल उन्हीं वास्तविक और पात्र नागरिकों तक पहुंचे, जिनके लिए यह व्यवस्था बनाई गई है।

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