भोपालः मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने ग्रीन बिल्डिंग तकनीक पर अखिल भारतीय सेमिनार का शुभारंभ किया। इस दौरान मुख्यमंत्री डॉ. यादव और लोक निर्माण मंत्री राकेश सिंह ने पीडब्ल्यूडी की स्मारिका, आईबीसी की पत्रिका का लोकार्पण किया। साथ ही आईआईटी इंदौर और आईबीसी के बीच एवं गृह संस्था और पीडब्ल्यूडी के बीच में एमओयू साइन हुआ।

इस मौके पर मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने सेमिनार को संबोधित करते हुए कहा कि अतीत के काल के वैसे तो कई सारे उदाहरण है लेकिन इतिहास में भोजपत्र में हमारे इसी राज्य के राजा, राजा भोज ने इन सारी बातों को लिपिबद्ध किया और उन्होंने अपने जीवनकाल में लागू करके दिखाया है। ऐसे में उनके माध्यम से यह जो पांच तत्वों का शरीर है, जैसा हमारा पिंड है वैसा ही ये सामने का हमारा संसार है। लेकिन एक तत्व के अंदर चारों तत्व मिलते हैं। पृथ्वी की बात कर लें तो पृथ्वी प्रधान हो गई लेकिन इस पर जल भी मिलेगा, वायु भी मिलेगी और पृथ्वी पर अग्नि भी मिलेगी। जबकि वह आकाश में स्वयं घूम रही है, तो आकाश उसके चारों तरफ है।

आज के दौर की दृष्टि से देखें प्राचीन काल की कई प्रकार की चीजों के लिए। मैं PWD को IBC को ग्रीन बिल्डिंग से जुड़े इस महत्वपूर्ण विषय़ के लिए आपको बधाई देना चाहता हूं। कुछ उदाहरण भी मैं देना चाहता हूं। जैसे जीपीएस तो अभी बना है, लेकिन कालगणना की नगरी, महाकाल की नगरी समय का सेंटर। अब तो जीपीएस रखो पृथ्वी अपने 23.26 झुकी हुई है। और यह झुकने वाला प्वाइंट भी घूमता हुआ है। प्राचीन दृष्टि से देखा जाय तो वह हम मान सकते हैं कि पृथ्वी शेषनाग के ऊपर टिकी है। तो वह जब बिचलन करते हैं तो वह कंपायनमान होता है। लेकिन जब हम प्रत्यक्ष अपनी आंखों से देंखें तो जो वह प्वाइंट महाकाल के ऊपर था वह खिसक कर 32 किलोमीटर दूर चला गया।

इसके लिए हमने एक ऑबजर्वेटरी बनाई है साइंस टेक्नोलॉजी के साथ मिलकर। लेकिन इस प्वॉइंट की खोज करने के लिए यह हमारे दो दिन बहुत महत्व के हैं। अपने यहां इस तरह से माना जाता है कि सूर्यनारायण, उत्तरायण से दक्षिणायन में जाते हैं। आज के टाइम में संक्रांति वह अवधि है। 21 जून और 22 दिसंबर दो दिन होते हैं। जहां सूर्य अपनी कक्षा बदलता है। आपके सामने दिन के 12.27 बजे ठीक उसी प्वाइट सूर्य छाय़ा अपने आप में जीरो हो जाती है।
भोपाल के इस कार्यक्रम में तो मजा आया लेकिन दो महीने बाद इस कार्यक्रम को हम मांडव में करें तो मांडव वह अद्भुत स्थान है जो जल का प्रोपर प्रबंधन करते हुए लगभग एक हजार साल पहले की रचना का है।