{ शिवम् की रिपोर्ट }
आगरा को ताज नगरी कहा जाता है क्यूंकि मोहब्बत की निशानी ताजमहल इसी शहर में है। पूरी दुनिया से लोग ताज का दीदार करने आते है और उसे अपनी आँखों में समा लेते है।
लेकिन इस नगरी में और देश में कुछ तो ऐसा ख़ास है कि जो एक बार भारत आता है बस यही का होकर रह जाता है।
दरअसल इस देश की संस्कृति और सभ्यता में इतना अपनापन है कि कोई इसे अपना बनाये बिना रह ही नहीं सकता।
इस विश्व की किसी भी सभ्यता के विवाह में यह कल्पना नहीं की जाती कि
धैरहं पृथिवीत्वम् . रेतोऽहं रेतोभृत्त्वम् . मनोऽहमस्मि वाक्त्वम् . सामाहमस्मि ऋकृत्वम् . सा मां अनुव्रता भव। गृभ्णामि ते सुप्रजास्त्वाय हस्तं मया पत्या जरदष्टिर्यथासः. भगो अर्यमा सविता पुरन्धिर्मह्यांत्वादुःगार्हपत्याय देवाः।
इन मंत्रों में जन्म जन्मांतर तक हाथ थामने का वचन है। साथ रहने का वचन है। मन से शरीर से वचन से कर्म से एक हो जाने का प्रण है। इसलिए जो भी यहां आया उसे इस धरती से प्रेम हुआ।
एक विदेशी युवती के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ है। दरअसल पांच साल पहले ताज देखने आयी महिला को यही के एक युवक की सादगी इतनी भा गयी की उसे ही जन्म जन्म का साथी बनाने की ठान ली।
जब विवाह का समय आया तो कोरोना के कारण देश में पीएम को लॉक डाउन करना पड़ा लेकिन आज तीन महीने इंतजार के बाद दोनों प्रेमियों की मोहब्बत को एक मुकाम और एक नया नाम मिल गया है।
जिला मुख्यालय पर विशेष विवाह अधिनियम के तहत दोनों प्रेमियों ने विवाह किया और एक दूसरे के हो गए। जन्म जन्मांतर का विधान सिर्फ हिन्दू धर्म में है और यही कारण है कि जब कोई भी विदेशी यहां आता है तो रिश्ते जोड़े बिना नहीं जाता।