नई दिल्ली। दिल्ली में कब्रिस्तान के लिए निःशुल्क सरकारी भूमि उपलब्ध कराने की मांग को लेकर इंद्रप्रस्थ पुनर्जागरण न्यास ने चिंता व्यक्त की है। न्यास का कहना है कि सार्वजनिक भूमि के आवंटन में किसी भी प्रकार का धार्मिक आधार पर विशेष अपवाद भविष्य में संवैधानिक, प्रशासनिक और सामाजिक स्तर पर कई सवाल खड़े कर सकता है।
न्यास के अध्यक्ष सुरेन्द्र कुमार गुप्ता ने कहा कि दिल्ली जैसे महानगर में भूमि सीमित और अत्यंत मूल्यवान संसाधन है। ऐसे में सरकारी भूमि का आवंटन निर्धारित नीतियों, पारदर्शी प्रक्रियाओं और समान अवसर के सिद्धांतों के आधार पर किया जाना चाहिए।उन्होंने कहा कि संविधान प्रत्येक नागरिक को समानता का अधिकार देता है। इसलिए सार्वजनिक संसाधनों के उपयोग और वितरण में भी समानता एवं निष्पक्षता के सिद्धांतों का पालन आवश्यक है। न्यास के अनुसार, यदि किसी एक समुदाय या संस्था को निःशुल्क सरकारी भूमि उपलब्ध कराई जाती है, तो भविष्य में अन्य धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक संस्थाओं की ओर से भी इसी तरह की मांगें उठ सकती हैं।
न्यास ने कहा कि दिल्ली की सरकारी भूमि पूरे समाज की साझा संपत्ति है और इसका इस्तेमाल व्यापक जनहित को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए। राजधानी में आवास, शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण संरक्षण, सार्वजनिक सुविधाओं और आधारभूत ढांचे के विस्तार के लिए भी भूमि की आवश्यकता है। इसलिए भूमि आवंटन से जुड़े किसी भी निर्णय में दीर्घकालिक सार्वजनिक हित को सर्वोच्च प्राथमिकता मिलनी चाहिए।
इंद्रप्रस्थ पुनर्जागरण न्यास ने दिल्ली सरकार, दिल्ली विकास प्राधिकरण (DDA) और अन्य संबंधित प्राधिकरणों से आग्रह किया है कि उच्च न्यायालय के समक्ष भूमि उपलब्धता, मौजूदा नीतियों और संभावित दूरगामी प्रभावों से जुड़ा वस्तुनिष्ठ एवं व्यापक पक्ष रखा जाए।न्यास ने स्पष्ट किया कि वह किसी भी समुदाय के धार्मिक अधिकारों का विरोध नहीं करता। उसका कहना है कि सार्वजनिक संसाधनों के वितरण में सभी नागरिकों और संस्थाओं के लिए समान नीति लागू होनी चाहिए।
सुरेन्द्र कुमार गुप्ता के अनुसार, सार्वजनिक भूमि के उपयोग में समानता, पारदर्शिता और जनहित को आधार बनाया जाना चाहिए। न्यास का कहना है कि सीमित भूमि संसाधनों के इस्तेमाल में ऐसी व्यवस्था नहीं बननी चाहिए, जिससे भविष्य में विभिन्न समूहों के बीच विशेषाधिकार की प्रतिस्पर्धा पैदा हो।
मुख्य बिंदु
दिल्ली में कब्रिस्तान के लिए निःशुल्क सरकारी भूमि की मांग पर न्यास की चिंता।
सार्वजनिक भूमि आवंटन में समान नीति और पारदर्शी प्रक्रिया की मांग।
भूमि को पूरे समाज की साझा संपत्ति बताते हुए जनहित को प्राथमिकता देने की अपील।
दिल्ली सरकार और DDA से उच्च न्यायालय के समक्ष व्यापक पक्ष रखने का आग्रह।
न्यास ने धार्मिक अधिकारों का विरोध नहीं, बल्कि समान नीति की पैरवी की।