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ओरछा रामराजा मंदिर घोटाला मामला: 9 साल बाद हाईकोर्ट ने एफआईआर रद्द की

ओरछा रामराजा मंदिर में दान राशि अनियमितता के मामले में 2017 में दर्ज एफआईआर को मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने 9 साल बाद रद्द कर दिया। मामले में तत्कालीन लिपिक पर लगे आरोपों को पर्याप्त सबूतों के अभाव में खारिज किया गया। लोकायुक्त जांच में भी आरोप निराधार पाए गए थे।

By: Nivedita 
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ओरछा रामराजा मंदिर घोटाला मामला: 9 साल बाद हाईकोर्ट ने एफआईआर रद्द की

निवाड़ी/ओरछा। मध्यप्रदेश के प्रसिद्ध धार्मिक स्थल ओरछा स्थित रामराजा सरकार मंदिर से जुड़ा लगभग 9 वर्ष पुराना कथित वित्तीय अनियमितताओं का मामला अब एक बड़े कानूनी मोड़ पर पहुंच गया है। मामले में लगाए गए आरोपों के आधार पर दर्ज एफआईआर को मध्यप्रदेश हाईकोर्ट, जबलपुर ने रद्द कर दिया है।

2017 में हुई थी शिकायत और शुरू हुई जांच

यह मामला वर्ष 2017 का है, जब ओरछा (तत्कालीन टीकमगढ़ जिला) के रामराजा मंदिर में दान राशि और आभूषणों में कथित गड़बड़ी की शिकायत तत्कालीन कलेक्टर प्रियंका दास को की गई थी। शिकायत पर जांच के लिए एसडीएम जतारा आदित्य सिंह को जिम्मेदारी सौंपी गई थी। जांच रिपोर्ट में 16 बिंदुओं पर अनियमितताओं का उल्लेख किया गया था, जिसके बाद तत्कालीन लिपिक मुन्ना लाल तिवारी की सेवाएं समाप्त कर उनके खिलाफ ओरछा थाने में एफआईआर दर्ज कराई गई थी।

गंभीर धाराओं में दर्ज हुई थी एफआईआर

10 सितंबर 2017 को दर्ज एफआईआर में आईपीसी की धाराएं 409, 420, 425, 426, 467, 468, 471 सहित कई गंभीर प्रावधान शामिल थे। शिकायत में आरोप था कि मंदिर के दान और चढ़ावे में वित्तीय अनियमितताएं की गई हैं।

बचाव पक्ष का दावा और जांच रिपोर्ट

याचिकाकर्ता का कहना था कि वह केवल लिपिकीय कार्य करता था, जबकि मंदिर के वित्तीय और प्रशासनिक निर्णय वरिष्ठ राजस्व अधिकारियों द्वारा लिए जाते थे। उनका यह भी दावा था कि जांच में उनके खिलाफ किसी प्रकार के गबन या जालसाजी के ठोस सबूत नहीं मिले। वहीं 2019 में लोकायुक्त संगठन द्वारा की गई जांच रिपोर्ट में भी आरोपों को निराधार बताया गया था।

हाईकोर्ट का फैसला और एफआईआर रद्द

लंबे समय तक चली कानूनी प्रक्रिया के बाद मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई करते हुए एफआईआर को रद्द करने का आदेश दिया। कोर्ट के फैसले के बाद यह मामला एक बार फिर चर्चा में आ गया है।

 

जांच प्रक्रिया और प्रशासनिक भूमिका पर सवाल

इस पूरे प्रकरण में तत्कालीन अधिकारियों की भूमिका पर भी सवाल उठे हैं। शिकायतकर्ता का आरोप है कि जांच प्रक्रिया में गंभीर लापरवाही और भटकाव हुआ, जिसके कारण सही तथ्य सामने नहीं आ सके।

प्रशासनिक प्रतिक्रिया नहीं

न्यायालय के फैसले के बाद इस मामले से जुड़े वरिष्ठ पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों की ओर से फिलहाल कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।

 

रिपोर्ट – देवेश गुप्ता 

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