इस्लामिक सेंटर गत वर्षो से विभिन्न अवसरों पर इबादत (नमाज़ ,रोजा़, ज़कात, हज ,कु़र्बानी ) से संबंधित समाज की आसानी के लिए गाइडलाइन जारी करता रहा है।
इसी सिलसिले में कुछ दिन के बाद ईद उल अज़हा (बकरा ईद ) आने वाली है और उसकी एक अहम इबादत कुर्बानी है। मुस्लिम समाज इसका ख़्याल रखेगा और एक अच्छा शहरी और आदर्श मुसलमान होने का सुबूत देगा।
कुर्बानी हजरत इब्राहिम अलैहिस्सलाम की सुन्नत और अल्लाह का हुक्म है यह कोई रस्म ( परंपरा) नहीं है। उस पर हज़रत मोहम्मद साहब ने अमल किया है और अपनी उम्मत को भी इस पर अमल करने का हुक्म दिया है ।
कुर्बानी के दिनों में अल्लाह को कुर्बानी से बढ़कर कोई अमल पसंद नहीं , इसलिए मुस्लिम समाज को ईद उल अज़हा (बकरा ईद) के अवसर पर जहां तक मुमकिन हो कुर्बानी करने की कोशिश करनी चाहिए।
ईद उल अजहा बकरा ईद के मौके पर 10 साल से कम उम्र के बच्चे और 65 साल से ज्यादा उम्र के बड़े कुर्बानी के जानवरों को खरीदने के लिए मंडियों में ना जाएं। कुर्बानी का बदला सदका़ ,खै़रात और गरीबों की मदद या कोई दूसरा नेक काम नहीं हो सकता ।
जिन लोगों पर कुर्बानी वाजिब हो वो ख्वाइश और कोशिश के बावजूद अपनी जगह पर कुर्बानी ना कर सके तो वो दूसरी जगह पर अपनी कुर्बानी अदा कराएं और उसकी कोशिश भी करें अगर यह भी मुमकिन नहीं तो कुर्बानी के दिन गुज़रने के बाद कुर्बानी के बराबर रक़म गरीबों में सदका कर दें।
मुस्लिम समाज का़नून के अंदर रहते हुए दीन व शरीयत इस्लाम पर अमल करने की कोशिश करे और जिन जानवरों की कुर्बानी पर पाबंदी हो उनकी कुर्बानी हरगिज़ ना करें। जानवर की फोटो सोशल मीडिया पर ना डालें।
कुर्बानी के सिलसिले में कोरोना वायरस के चलते तमाम सावधानियां बरतें, जैसे : रास्तों, गलियों में कुर्बानी ना करें, कुर्बानी घरों के अंदर ही करें ,सफाई का विशेष ध्यान रखें। कुर्बानी से संबंधित केंद्र की गाइड लाइन का विशेष ध्यान रखें ।