बुधनीः सीहोर जिले की बुधनी विधानसभा में आदिवासी इलाका आज भी शिक्षा की बदहाली पर आंसू बहा रहा है। जबकि यह क्षेत्र करीब 20 साल तक पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का रहा है। यहां स्कूलों में समस्याओं का अंबार लगा हुआ है। स्कूल भवन जर्जर हैं, शिक्षक पूरे नहीं हैं, पीने के पानी की व्यवस्था ठप है और बच्चों की सुरक्षा को लेकर भी बड़ा खतरा बना हुआ है, क्योंकि स्कूल के सामने जंगल है। स्थिति यह है कि एक गांव के बच्चों को दूसरे गांव के स्कूल में शिफ्ट कर दिए गए, जहां एक कमरे में 55 बच्चे बैठकर पढ़ाई करने को मजबूर हैं। अधिकारियों ने पक्का पारचा प्राथमिक विद्यालय के भवन को जून 2025 में क्षतिग्रस्त घोषित कर दिया था। इसके बाद कक्षा 1 से 5 तक के बच्चों को पास के गांव बंदरझिरी के प्राथमिक विद्यालय में शिफ्ट कर दिया गया। जबकि बच्चों की गांव में ही वैकल्पिक व्यवस्था करनी चाहिए थी।
ग्रामीणों का कहना है कि स्कूल भवन को मरम्मत कर योग्य बनाया जा सकता था, लेकिन अधिकारियों ने इसे बंद कर सीधे बच्चों को शिफ्ट कर दिया। इसका असर बच्चों की पढ़ाई और नियमित स्कूल उपस्थिति पर भी साफ दिखाई दे रहा है। हालात ये हैं कि जहां बंदरझिरी स्कूल में बच्चों को शिफ्ट किया वहीं केवल दो कमरे हैं। एक कमरे में एक स्कूल के बच्चे बढ़ते हैं दूसरे कमरे में दूसरे स्कूल के बच्चे बैठने को मजबूर हैं। जबकि पहले यहां गांव के बच्चे अलग-अलग कक्षाओं में पढ़ते थे। इतनी भीड़ में न तो बच्चों को बैठने की जगह मिलती है और न ही पढ़ाई का सही माहौल।
यही नहीं स्कूल में सिर्फ एक ही शिक्षक है जो पूरे स्कूल का संचालन करता था। बच्चों को पढ़ाने के साथ-साथ मध्यान्ह भोजन, ऑनलाइन हाजिरी, रिकॉर्ड अपडेट और अन्य सरकारी कार्य भी एक ही शिक्षक को संभालनी पड़ती थी। इसकी शिकायत के बाद 1 दिन पहले ही शिक्षा विभाग ने अटैक शिक्षक मखनी यादव को वापस बंदरझिरी स्कूल भेजा। ऐसे में शिक्षा का स्तर प्रभावित होना स्वाभाविक है। जब इस संबंध में हमारे संवाददाता कन्हैया नाथ ने ब्लॉक शिक्षा अधिकारी श्रीमती शशि सिंह से बात हुई तो उन्होंने कुछ भी बोलने से साफ इंकार कर दिया।
गांव में नेटवर्क की स्थिति भी बेहद खराब है। ऑनलाइन हाजिरी शासन का नियम है, लेकिन स्कूल परिसर में नेटवर्क नहीं आता। ऐसे में शिक्षक मजबूरी में सड़क की तरफ जाते हैं, कई बार जंगल के किनारे तक जाना पड़ता हैं, तब जाकर नेटवर्क मिलता है और हाजिरी लग पाती है। इस समस्या का असर सीधे बच्चों की पढ़ाई पर पड़ता है, क्योंकि शिक्षक का समय पढ़ाने की बजाय नेटवर्क ढूंढने में निकल जाता है।
इस स्कूल की सबसे गंभीर और डराने वाली समस्या है बच्चों की सुरक्षा। स्कूल के सामने खुला जंगल है, लेकिन बच्चों के लिए खेलने का मैदान ही नहीं है। ग्रामीणों का कहना है कि जंगल में जंगली जानवरों की मौजूदगी रहती है और पूर्व में कई बार बच्चों पर हमले की घटनाएं भी हो चुकी हैं। ऐसे में जब बच्चे बाहर खेलते हैं, तो हमेशा डर बना रहता है कि कहीं कोई बड़ा हादसा न हो जाए। स्कूल के आसपास सुरक्षा के लिए कोई बाउंड्रीवाल नहीं है और न ही कोई सुरक्षा व्यवस्था। ऐसे में बच्चों को खुले जंगल के सामने पढ़ाई करने को मजबूर होना पड़ रहा है।
ग्रामीणों के मुताबिक सड़क निर्माण के दौरान करीब एक किलोमीटर दूर पाइपलाइन टूट गई थी, लेकिन एक साल से ज्यादा समय बीत जाने के बाद भी उसकी मरम्मत नहीं कराई गई। स्कूल परिसर में लगी पानी की टंकी सूखी पड़ी है। बच्चों को मजबूरी में हैंडपंप पर निर्भर रहना पड़ता है उसमें भी बड़ी मुश्किल से पानी निकल पाता है। इतना ही नहीं, स्कूल में जो कनेक्शन मौजूद है, वह भी बंद पड़ा है।
खांडाबड़ मिडिल स्कूल में भी हालात चिंताजनक बताए जा रहे हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि वहां वर्ष1998 से शौचालय, बाथरूम और पानी टंकी जर्जर हालत में पड़ी है। बच्चों को मजबूरी में दूसरी बिल्डिंग में जाकर शौचालय का उपयोग करना पड़ता है, जो खासकर छात्राओं के लिए गंभीर परेशानी बन चुका है।
इधर इस पूरे मामले को लेकर कांग्रेस ने पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और भाजपा सरकार पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि सरकार शिक्षा सुधार के बड़े-बड़े दावे करती है, लेकिन आदिवासी अंचल के बच्चों को न सुरक्षित स्कूल मिल रहा है, न पानी, न शिक्षक और न ही मूलभूत सुविधाएं। उन्होंने प्रशासन से मांग की है कि तत्काल स्कूल भवन, शिक्षक व्यवस्था और पानी की सुविधा बहाल की जाए। सरकार के विकास और शिक्षा सुधार के दावे यहां खोखले नजर आ रहे हैं। अब देखना होगा कि शिक्षा विभाग और प्रशासन कब तक इस गंभीर समस्या पर ठोस कार्रवाई करता है।