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बाबरी मस्जिद का ढांचा गिराने का कल्याण सिंह को नहीं था कोई अफसोस, PM मोदी से पहले ही मिली ये उपाधि…

उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री, राजस्थान के पूर्व राज्यपाल और राम मंदिर आंदोलन के प्रमुख नायकों में शुमार कल्याण सिंह (Kalyan Singh) का शनिवार को लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया।

By RNI Hindi Desk 
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नोएडा: उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री, राजस्थान के पूर्व राज्यपाल और राम मंदिर आंदोलन के प्रमुख नायकों में शुमार कल्याण सिंह (Kalyan Singh) का शनिवार को लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया। भगवान राम के प्रति उनकी आस्था का इससे बड़ा प्रमाण क्या होगा कि उन्होंने कारसेवकों पर गोली चलवाने के बजाय मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना मंजूर किया था। राम मंदिर को लेकर कल्याण सिंह (Kalyan Singh) का नजरिया बिल्कुल साफ था। 1991 में पहली बार भाजपा को सत्ता तक पहुंचाने के बाद कल्याण सिंह शपथ ग्रहण समारोह के बाद सीधे अयोध्या पहुंचे थे। वहां उन्होंने संकल्प लिया था कि ‘कसम राम की खाते हैं, मंदिर यहीं बनाएंगे’।

6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में विवादित ढांचा गिराया गया था। इस मामले पर जब सवालों की बौछार उनकी तरफ गिरी तो उन्होंने अपने अंदाज में कहा था कि ‘कोई अफसोस नहीं है’। राम मंदिर को लेकर जब सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया तो कल्याण सिंह ने बयान जारी करते हुए कहा था कि अब विश्वास है कि मंदिर बनने जा रहा है, मैं चैन-शांति से मृत्यु का वरण कर सकता हूं। उन्होंने कहा था कि मेरी इच्छा है जीवनकाल में भव्य मंदिर पूरा हो जाए।

भारतीय राजनीति में नरेंद्र मोदी से पहले कल्याण सिंह को ही हिंदू हृदय सम्राट की उपाधि मिली थी। सिंह ने भारतीय जनता पार्टी के लिए जिस ‘राम’ नाम के जिस बीज बोया था उसे नरेंद्र मोदी ने विशाल वृक्ष में तब्दील कर दिया। उनके तेवरों का ही परिणाम था कि बीजेपी के प्रति लोगों की आस्था बढ़ती चली गई। पार्टी में उनका उदय जितनी तेजी से हुआ था, उनका पतन भी उतनी ही तेजी से हुआ।

भाजपा में कल्याण सिंह का उदय: 30 अक्टूबर 1990, उस वक्त मुलायम सिंह यादव उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री हुआ करते थे। पुलिस द्वारा कार सेवकों पर गोली चलाने का मामला सामने आया। भारतीय जनता पार्टी के हिंदुत्व चेहरे को लेकर सरकार पर बरसने का काम कल्याण सिंह ने किया था। देखते ही देखते उनकी गिनती पार्टी के सर्वोच्च नेताओं में होने लगी और 1991 में वह प्रदेश के मुखिया बन गए।

भारतीय जनता पार्टी में उनका पतन 1996 के बाद से शुरू हुआ। अटल बिहारी वाजपेयी से उनके बिगड़ते रिश्तों का परिणाम यह हो गया कि सिंह सार्वजनिक तौर पर पूर्व प्रधानमंत्री के खिलाफ बयानबाजी कर बैठे। जिसके चलते पार्टी में उनके प्रति भारी नाराजगी पैदा हो गई। जो सरकार एक वोट से गिरी थी, उसके लिए कल्याण सिंह को जिम्मेदार माना जाने लगा। कल्याण सिंह को तत्कालीन बीजेपी राष्ट्रीय अध्यक्ष कुशाभाऊ ठाकरे ने 6 सालों के लिए पार्टी से बाहर कर दिया था।

जेपी से बाहर होने के बाद कल्याण सिंह ने अपनी पार्टी ‘राष्ट्रीय क्रांति’ का गठन किया, 2002 के विधानसभा चुनावों में 4 सीटें जीतीं और मुलायम सिंह के साथ हो गए। 2004 में उन्हें दोबारा बीजेपी में बुलाया गया और 2007 के विस चुनावों की जिम्मेदारी देते हुए पार्टी का चेहरा बना दिया, यहां मिली करारी हार के बाद कल्याण सिंह का पार्टी से मोहभंग हो गया और 2009 में फिर पार्टी छोड़ दी। आखिर में वह 2014 में बीजेपी में शामिल हुए और कहा कि आखिरी सांस तक बीजेपी के साथ रहूंगा।

2004 में जब पार्टी में उनकी वापसी हुई तो उन्हें बुलंदशहर लोकसभा सीट से उतारा गया। बुलंदशहर में एक पत्रकार वार्ता के दौरान कल्याण सिंह से पूछा गया कि अटल बिहारी वाजपेयी के साथ आपके रिश्ते बिगड़ गए थे, आपने काफी कुछ कहा था, ऐसे में आपकी वापसी कैसे हुई, इसके जवाब में सिंह ने कहा कि जब मैं वाजपेयी जी पर अंगुली उठा रहा था, तब एक उनकी तरफ थी और चार मेरी तरफ। जब मैंने उन्हें पांचों अंगुलियों से मिठाई खिलाई तो कड़वाहट खत्म हो गई।

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