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UNSC में भारत की बड़ी कामयाबी, अब दूसरे देशों के खिलाफ अफगानिस्तानी जमीन का इस्तेमाल नहीं कर सकेगा तालिबान

अफगानिस्तान पर तालिबान के कब्जे के बाद से लगातार आतंकी संगठनों द्वारा अफगानी जमीन का इस्तेमाल का संकट अन्य देशों पर मंडरा रहा था, इसे लेकर भारत ने एक बड़ी कामयाबी हासिल की है। दरअसल भारत ने UNSC की बैठक में अफगानिस्तान में तालिबान राज आने के बाद किसी दूसरे देश के खिलाफ जमीन का इस्तेमाल न होने का प्रस्ताव पारित किया है।

By Amit ranjan 
Updated Date

नई दिल्ली : अफगानिस्तान पर तालिबान के कब्जे के बाद से लगातार आतंकी संगठनों द्वारा अफगानी जमीन का इस्तेमाल का संकट अन्य देशों पर मंडरा रहा था, इसे लेकर भारत ने एक बड़ी कामयाबी हासिल की है। दरअसल भारत ने UNSC की बैठक में अफगानिस्तान में तालिबान राज आने के बाद किसी दूसरे देश के खिलाफ जमीन का इस्तेमाल न होने का प्रस्ताव पारित किया है। हालांकि सोमवार को पारित हुए इस प्रस्ताव पर वोटिंग से चीन और रूस गायब रहें।

प्रस्‍ताव कहता है कि अफगानिस्‍तान की जमीन का इस्‍तेमाल आतंकियों को शरण देने के लिए नहीं होगा। यह इसलिए अहम है क्‍योंकि तालिबान के उभरने पर पाकिस्‍तान समर्थ‍ित आतंकी समूहों के और मजबूत होने का खतरा है, जो भारत के लिए चिंता की बात है। आपको बता दें कि लश्‍कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्‍मद की गतिविधियां तेज होने के खुफिया इनपुट्स के बीच तालिबान पर एक तरह से पूरी दुनिया का दबाव बना दिया गया है। अंतरराष्‍ट्रीय समुदाय चाहता है कि तालिबान ने शांति और सुरक्षा से जुड़े जो वादे किए हैं, उनपर खरा उतरे।

आपको बता दें कि सुरक्षा परिषद ने अफगानिस्‍तान में तालिबान के शासन को मान्‍यता दे दी है। फ्रांस, यूके और अमेरिका की तरफ से पेश प्रस्‍ताव का भारत समेत कुल 13 देशों ने समर्थन किया। विपक्ष में एक भी वोट नहीं पड़ा। हालांकि वीटो पावर रखने वाले रूस और चीन ने वोटिंग में हिस्‍सा नहीं लिया। इन दोनों देशों का तालिबान के साथ मजबूत गठजोड़ बनता दिख रहा है। चीन और तालिबान के बीच तो काबुल में राजनयिक स्‍तर की बातचीत भी हो चुकी है।

रुस ने किया विरोध

UN में रूस की राजदूत वैसिली नेबेंजिया ने कहा कि उनका देश वोटिंग से दूर रहने पर ‘मजबूर’ हो गया क्‍योंकि ‘ड्राफ्ट तैयार करने वालों ने हमारी मूल चिंताओं को नजरअंदाज कर दिया था।’ उन्‍होंने कहा कि प्रस्‍ताव में आतंकी खतरे को लेकर पर्याप्‍त स्‍पष्‍टता नहीं थी। इसके अलावा अफगानों को निकालने से वहां होने वाले ‘ब्रेन ड्रेन’ पर कोई बात नहीं की गई। इसके अलावा तालिबानी नियंत्रण के बाद अमेरिका के अफगान सरकार के खातों को बंद करने के आर्थिक और मानवीय प्रभावों पर भी प्रस्‍ताव में कुछ नहीं है।

चीन ने की अमेरिका की निंदा

चीन ने भी रूस जैसी ही चिंताएं सामने रखीं। चीन ने एक ड्रोन हमले में कुछ नागरिकों के मारे जाने को लेकर अमेरिका की निंदा की जिसे लेकर अमेरिका ने कहा था कि हमला इस्‍लामिक स्‍टेट के लड़ाकों को उड़ाने के लिए था। बीजिंग ने कहा कि अभी जो अफरातरफरी मची है वह पश्चिमी देशों के ‘जल्‍दबाजी में निकलने’ की वजह से है।

जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर का खात्मा जरूरी

बता दें कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की बैठक के दौरान भारत ने जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए-तैयबा जैसे आतंकी संगठनों को खत्म करने की जरूरत बताई है। हालांकि सुरक्षा परिषद की बैठक के दौरान रूस और चीन का रवैया हैरान करने वाला था। तालिबान के जिस राज से पूरी दुनिया आशंकित है, उसे दोनों ही देश खुला समर्थन करते दिखे हैं। यही नहीं रूस ने कहा कि इस प्रस्ताव से अफगानिस्तान पर बुरा प्रभाव पड़ेगा और वहां की सरकार तक संसाधनों की पहुंच नहीं होगी। इससे अफगानिस्तान का विकास प्रभावित हो सकता है।

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