फॉस्फेट प्राकृतिक रूप से फॉस्फोरस के रूप में पाए जाते हैं और कैल्शियम के बाद मानव शरीर में दूसरा सबसे प्रचुर तत्व होता है। हालांकि, गुर्दे की पुरानी बीमारी के रोगियों में फॉस्फोरस की प्रचुर मात्रा होने से एक गंभीर चिंता पैदा हो जाती है क्योंकि यह खून में कैल्शियम के स्तर को कम करता है और कई अन्य स्वास्थ्य बीमारियों जैसे हृदय का कैल्सीफिकेशन, चयापचय(Metabolism) हड्डी रोग और माध्यमिक हाइपरपरैथायराइडिज्म (SHPT) के विकास का कारण बन सकता है।
आम तौर पर, फॉस्फेट आंत में पचा हुआ भोजन से अवशोषित होता है और सामान्य परिस्थितियों में अगर सामान्य फॉस्फेट अवशोषण की तुलना में अधिक है, तो गुर्दे किसी तरह बढ़े हुए उत्सर्जन से निपटने में सक्षम होते हैं। लेकिन अगर गुर्दे की क्रिया बाधित हो जाती है, तो भी मामूली रूप से उठाया जाने वाला फॉस्फेट अवशोषण “हाइपरफॉस्फेटिमिया” पैदा कर सकता है।
हाइपरफॉस्फेटिमिया वह रोग है जो किडनी की पुरानी बीमारी (CKD) के मरीजों में ज्यादातर देखने को मिलती है। इस बिमारी के होने पर फॉस्फेट का स्तर शरीर के अंदर असामान्य रूप से बढ़ जाता है। यह फॉस्फेट के सेवन में वृद्धि या फॉस्फेट उत्सर्जन में कमी से उत्पन्न होता है। यह एक डिसऑर्डर है जो अंतर कोशिकीय फॉस्फेट को बाह्य कोशिकीय में परिवर्तित करता है, लेकिन हमारे गुर्दे का स्वास्थ्य होना बहुत जरूरू है क्योंकि यह हमारे शरीर में एक बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निर्वहन करता है जिसमें खून से फॉस्फेट की मात्रा को नियंत्रित करना इसके कई कामों में से केवल एक कार्य है।
ऐसा देखा गया है की कभी-कभी हाइपरफॉस्फेटिमिया वाले रोगी हाइपरकैलसेमिक (पोटैशियम) के लक्षण जैसे रोगियों की तरह महसूस करते हैं। जिसके कारण वे मांसपेशियों में ऐंठन, सुन्नता या झुनझुनी की शिकायत करते हैं। वहीं अन्य लक्षणों में हड्डी या जोड़ों में दर्द, चकत्ते आदि शामिल हो सकते हैं।
हाइपरफॉस्फेटिमिया की पहचान रक्त का परीक्षण करके निम्न स्तर पर माप सकते हैं:
हाइपरफॉस्फेटिमिया का निदान करना और उसका पता लगाना महत्वपूर्ण है ताकि सामान्य फॉस्फेट चयापचय (METABOLISM) का इलाज और दोबारा क्रियान्वयन किया जा सके। विभिन्न दवाएं रक्त में फॉस्फेट के स्तर को सामान्य करने में मदद कर सकती हैं। आहार में परिवर्तन करके या आहार में फास्फोरस का सेवन कम करके भी, खासकर गुर्दे के रोगियों के मामले में मदद कर सकता है।
| न खाएं ये प्रोडक्ट | फॉस्फोरस की मात्रा(प्रति 100 ग्राम पर mg में) |
| दूध | 111 से 138 |
| पनीर | 197 |
| दही | 144 |
| नट्स | 111 |
| पीनट बटर | 335 |
| सूखी बीन्स | 250 |
| बेक्ड बीन्स | 110 |
| काली बीन्स | 130 |
| गारबान्ज़ो बीन्स | 96 |
| राजमा | 406 |
| दालें | 178 |
| सोयाबीन | 704 |
| कोको | 17 |
| पेय चॉकलेट | 87 |
| डार्क कोला | 50 से 60 |
| बैगन | 24 |
| शरीफा | 21 |
| बीयर | 140 |
| ओट्स | 408 |
| मैदा | 34 |
| केले | 22 |
| संतरे | 23 |
| किशमिस | 102 |
| आलूबुखारा | 27 |
| लौकी के बीज | 100 |
| चिकन | 370 |
| गेहूं | 58 |
| एन्गॉग | 265 |
| आलू | 38 |
| चीज | 438 |
| हरी मटर | 108 |
| अलसी बीज | 642 |
| लीमा बीन्स | 136 |
| ब्राउन राइस | 103 |
| राई | 728 |
| तिल | 774 |
| बादाम | 481 |
| टोफू | 483 |
| सैल्मन मछली | 261 |
वास्तव में , फॉस्फोरस का उच्च स्तर पर जाना किडनी डिसऑर्डर से संबंधित है। यह बताता है कि आपके गुर्दे को आपके शरीर के रक्त से फास्फोरस को साफ़ करने में दिक्कत हो रही है। वहीं फॉस्फोरस के उच्च स्तर का दूसरा मतलब अनियंत्रित मधुमेह और अन्य अंतःस्रावी(endocrine) विकार भी हो सकता है।
Disclaimer: प्रिय पाठक, हमारी यह खबर पढ़ने के लिए आपका आभार। यह खबर आपको केवल जागरूक करने के मक़सद से लिखी गई है। हमने इसको लिखने में सामान्य जानकारियों की मदद ली है। आप कहीं भी कुछ भी अपनी सेहत से जुड़ा पढ़ें तो, उसे अपनाने से पहले डॉक्टर से सलाह जरूर लें।