पांगरी बांध परियोजना को लेकर किसानों का आक्रोश लगातार बढ़ता जा रहा है। सरकार और प्रशासन की लंबे समय से जारी चुप्पी के विरोध में किसानों ने 4 जनवरी को एक अनोखा और प्रतीकात्मक आंदोलन किया। बड़ी संख्या में किसान उतावली नदी के तट पर एकत्र हुए और भैंसों के आगे बीन बजाकर उस प्रसिद्ध मुहावरे-“भैंस खड़ी पगुराय” को सजीव रूप दे दिया। किसानों का कहना था कि उनकी मांगों को लगातार नजरअंदाज किया जा रहा है, इसलिए यह प्रतीकात्मक विरोध सरकार तक अपनी पीड़ा पहुंचाने का माध्यम बना।
इससे पहले 31 दिसंबर को किसानों ने अनुविभागीय कार्यालय, नेपाल नगर में हल्ला बोल आंदोलन किया था। उस दौरान भी किसानों ने परियोजना से जुड़े मुआवजा, पुनर्वास और अधिकारों से संबंधित मुद्दों को प्रमुखता से उठाया, लेकिन प्रशासन की ओर से कोई ठोस और सकारात्मक जवाब नहीं मिला। इसी निराशा के चलते किसानों ने अब यह अनोखा प्रदर्शन करने का फैसला लिया।
आंदोलन का नेतृत्व कर रहे डॉ. रवि कुमार पटेल ने कहा कि भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन कानून 2013 के तहत ग्रामीण क्षेत्रों में भूमि अधिग्रहण पर दोगुना मुआवजा किसानों का कानूनी अधिकार है। उन्होंने आरोप लगाया कि पांगरी बांध परियोजना में नियमों की अनदेखी की जा रही है और किसानों को उनके अधिकारों से वंचित किया जा रहा है।
डॉ. पटेल ने यह भी आरोप लगाया कि इस परियोजना के नाम पर किसानों, आदिवासियों, दलितों और पिछड़े वर्गों का शोषण हो रहा है। आंदोलन में बड़ी संख्या में किसान और आदिवासी समुदाय के लोग शामिल हुए। सभी ने शांतिपूर्ण ढंग से अपनी मांगें दोहराईं और सरकार से न्याय की अपील की।
किसानों का कहना है कि भैंस के आगे बीन बजाने का यह प्रतीकात्मक आंदोलन दरअसल प्रशासन के असंवेदनशील रवैये को दर्शाता है। उनका स्पष्ट संदेश है कि यदि अब भी सरकार ने उनकी मांगों पर ध्यान नहीं दिया, तो आंदोलन को और व्यापक रूप दिया जाएगा।
पांगरी बांध परियोजना को लेकर किया गया यह अनूठा किसान आंदोलन न सिर्फ प्रशासन की अनदेखी पर सवाल खड़े करता है, बल्कि यह भी दिखाता है कि जब संवाद के सभी रास्ते बंद हो जाते हैं, तो किसान प्रतीकों के जरिए अपना विरोध दर्ज कराने को मजबूर हो जाते हैं। अब देखना यह है कि सरकार इस संदेश को कितनी गंभीरता से लेती है।