नई दिल्ली: केंद्र ने आपराधिक कानूनों में सुधार पर सुझाव देने के लिए एक समिति का गठन किया गया, और राज्य सरकारों, अदालतों और बार काउंसिल से सुझाव मांगे हैं। केंद्रीय गृह राज्य मंत्री किशन रेड्डी ने बुधवार को राज्यसभा को एक प्रश्न के लिखित उत्तर में यह जानकारी दी है।
उन्होंने कहा कि आपराधिक कानूनों में सुधार के सुझाव के लिए गठित समिति का नेतृत्व राष्ट्रीय कानून विश्वविद्यालय, दिल्ली के कुलपति करते हैं।
उन्होंने आगे कहा “गृह मंत्रालय ने आपराधिक कानूनों में व्यापक संशोधनों पर राज्यों, केंद्र शासित प्रदेशों, सर्वोच्च न्यायालय, उच्च न्यायालयों, बार काउंसिल ऑफ इंडिया, बार काउंसिल ऑफ स्टेट्स और विभिन्न विश्वविद्यालयों और कानून संस्थानों से भी सुझाव मांगे हैं।
आप को बता दें कि रेड्डी ने बताया ‘‘परामर्श मिल चुके हैं और समिति की रिपोर्ट पर गृह मंत्रालय विभिन्न पक्षों के साथ विचार विमर्श कर रहा है।
गृह राज्य मंत्री किशन रेड्डी ने राज्यसभा को एक प्रश्न के लिखित उत्तर में कहा कि , “प्राप्त सुझावों और समिति की रिपोर्ट सभी हितधारकों के परामर्श से गृह मंत्रालय द्वारा जांच के अधीन है। उन्होंने किसान आंदोलन बात करते हुए कहा कि तीन नये कृषि कानूनों के विरोध में प्रदर्शन कर रहे किसानों के काफिलों ने 26 जनवरी को बलपूर्वक दिल्ली आने की कोशिश की और इसके लिए उन्होंने पुलिस के अवरोधक भी अपने ट्रैक्टरों की मदद से तोड़ दिए।
शिवसेना सांसद अनिल देसाई के सवाल के जवाब में केंद्रीय गृह राज्य मंत्री किशन रेड्डी ने कहा कि किसानों के आंदोलन से दिल्ली के पड़ोसी राज्यों में लोगों के लिए स्थिति असुविधाजनक हो रही है। साथ ही केंद्र को भारी वित्तीय नुकसान हो रहा है।
आप को बता दे कि शिवसेना के राज्यसभा सांसद अनिल देसाई ने पूछा था कि किसानों से सरकार ने राष्ट्रीय राजधानी को खाली कराने पर क्या कार्रवाई की? जवाब में मंत्रालय ने कहा कि दिल्ली पुलिस ने सूचित किया है कि राष्ट्रीय राजधानी के गाजीपुर, चिल्ला ,टिकरी और सिंघु बॉर्डर पर आंदोलनकारी किसानों द्वारा बॉर्डर अवरूद्ध किए गए हैं। दिल्ली और इसके पड़ोसी राज्यों के निवासियों के लिए स्थिति असुविधाजनक है। किसी भी आंदोलन में जनता और सरकारों को वित्तीय नुकसान होता है।
उन्होंने आगे कहा ‘प्रदर्शनकारियों ने जो किया उसके बाद दिल्ली पुलिस के पास भीड़ को नियंत्रित करने के लिए आंसू गैस के गोले, पानी की धार छोड़ने और हल्का बल प्रयोग करने के अलावा और कोई दूसरा विकल्प नहीं था।’