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CM डॉ. मोहन यादव ने असम के सिल्क विलेज सुआलकुची का किया भ्रमण

रेशम उत्पादन की पारंपरिक प्रक्रिया को करीब से जाना...

By: Abhinav Tiwari 
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CM डॉ. मोहन यादव ने असम के सिल्क विलेज सुआलकुची का किया भ्रमण

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने गुरुवार को अपने असम प्रवास के दौरान गुवाहाटी के समीप स्थित ऐतिहासिक और सांस्कृतिक केंद्र सुआलकुची का भ्रमण किया। ‘सिल्क विलेज’ के नाम से प्रसिद्ध सुआलकुची पहुंचकर मुख्यमंत्री ने रेशम उत्पादन की प्राचीन और पारंपरिक बुनाई प्रक्रिया को बेहद करीब से देखा और इसकी तकनीकी बारीकियों की जानकारी प्राप्त की। उन्होंने असमिया संस्कृति से जुड़ी विश्व प्रसिद्ध मूगा रेशम बुनाई की पूरी प्रक्रिया का गहन अवलोकन किया।

बुनकरों के कौशल और परिश्रम से हुए प्रभावित

मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने सुआलकुची में बुनकरों के घरों और कार्यशालाओं का दौरा किया। उन्होंने देखा कि किस प्रकार लगभग हर घर में हाथकरघों के माध्यम से रेशम के आकर्षक वस्त्र तैयार किए जा रहे हैं। मुख्यमंत्री ने बुनकरों से सीधे संवाद करते हुए उनके श्रम, समर्पण और शिल्प कौशल की प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि यहां की पारंपरिक बुनाई तकनीक न केवल उत्कृष्ट कला का उदाहरण है, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था की मजबूत रीढ़ भी है।

‘पूर्व का मैनचेस्टर’ के रूप में पहचान

गुवाहाटी से लगभग 35 किलोमीटर दूर स्थित सुआलकुची को ‘पूर्व का मैनचेस्टर’ कहा जाता है। यह गांव अपनी विशिष्ट रेशम बुनाई तकनीकों के लिए देश ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है। यहां मुख्य रूप से तीन प्रकार के रेशम-मूगा (सुनहरा), पैट (हाथीदांत जैसा सफेद) और एरी (हल्का बेज)-का उत्पादन किया जाता है, जो असम की सांस्कृतिक पहचान का अभिन्न हिस्सा हैं।

संग्रहालयों में वस्त्र कला और विरासत का अवलोकन

भ्रमण के दौरान मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने बस्त्रा उद्यान और आमार सुआलकुची संग्रहालय का भी दौरा किया। संग्रहालयों में प्रदर्शित हाथकरघा गतिविधियों, रेशम उद्योग के विकास क्रम और पारंपरिक वस्त्रों की प्रदर्शनी ने उन्हें विशेष रूप से प्रभावित किया। मुख्यमंत्री ने यहां तैयार होने वाले पारंपरिक परिधानों-मेखला चादर, साड़ियां, कुर्ते और गमछे-की निर्माण प्रक्रिया को भी समझा।

कुटीर उद्योगों को सशक्त बनाने की दिशा में पहल

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा कि उनके इस भ्रमण का उद्देश्य अन्य राज्यों की श्रेष्ठ पारंपरिक कलाओं और कुटीर उद्योगों की कार्यप्रणाली को समझना है, ताकि इन अनुभवों का लाभ मध्यप्रदेश के शिल्प और हथकरघा क्षेत्र को दिया जा सके। उन्होंने विश्वास जताया कि ऐसी पारंपरिक कलाओं को संरक्षण और प्रोत्साहन देकर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को और अधिक मजबूत बनाया जा सकता है।

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