भोपाल स्थित विज्ञान भवन में आयोजित राष्ट्रीय शोधार्थी समागम में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री Dr. Mohan Yadav ने सहभागिता कर शोध, नवाचार और भारतीय ज्ञान परंपरा पर अपने विचार व्यक्त किए। कार्यक्रम में प्रदेश और देशभर से आए शोधार्थियों, शिक्षाविदों और विशिष्ट अतिथियों की उपस्थिति रही। मुख्यमंत्री ने प्रशासनिक परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि उन्हें कार्यक्रम के अंत में बोलने के लिए आमंत्रित किया गया था, जिसे उन्होंने एक प्रकार का “प्रशासनिक प्रयोग” बताते हुए हल्के-फुल्के अंदाज में प्रस्तुत किया।

इस अवसर पर परम पूज्य मिथिलेश नंदिनी शरण महाराज जी, सुप्रसिद्ध विचारक एवं वरिष्ठ प्रचारक सुरेश जी भाई साहब, प्रदेश के उच्च शिक्षा मंत्री इंद्र सिंह परमार जी, प्रोफेसर मधुकर जी, दत्तोपंत ठेंगड़ी संस्थान के अध्यक्ष अशोक पांडे जी, डॉ. मुकेश मिश्रा जी तथा डॉ. अनिल कोठारी जी सहित अनेक विद्वान मंचासीन रहे। मुख्यमंत्री ने सभी अतिथियों के उद्बोधनों की सराहना करते हुए कहा कि ऐसे बौद्धिक आयोजन शोधार्थियों के लिए मार्गदर्शक सिद्ध होते हैं।

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने अपने संबोधन में कहा कि आज के दौर में शोध और नवाचार पर पश्चिमी प्रभाव अधिक दिखाई देता है, जिससे भारतीय पारंपरिक ज्ञान पर “धूल” जमती जा रही है। उन्होंने कहा कि भारत की प्राचीन परंपरा में शोध केवल व्यक्तिगत लाभ या पद-प्रतिष्ठा के लिए नहीं, बल्कि समाज-हित के लिए किया जाता था।उनके अनुसार, भारतीय संस्कृति हमेशा ऐसे शोध को प्रेरित करती रही है जो समाज के काम आए और सामूहिक हित को आगे बढ़ाए।

मुख्यमंत्री ने अपने विधानसभा क्षेत्र का एक रोचक उदाहरण साझा किया। उन्होंने बताया कि एक ग्रामीण व्यक्ति ने अपने गाँव में मोरों की संख्या बढ़ाने के लिए एक अभिनव प्रयोग किया। उसने मोर के अंडों को एक अन्य पक्षी के नीचे रखकर उनसे मोर के बच्चे उत्पन्न किए।
डॉ. यादव ने इसे “सुधार का बोध” और वास्तविक शोध की संज्ञा दी। उन्होंने कहा कि यह प्रयोग किसी व्यक्तिगत लाभ के लिए नहीं, बल्कि प्रकृति प्रेम और पर्यावरण संरक्षण की भावना से किया गया था। उन्होंने इसे उन शोध कार्यों से अलग बताया, जिनका उद्देश्य कभी-कभी स्पष्ट नहीं होता।
मुख्यमंत्री ने एक राजनीतिज्ञ के रूप में पीएचडी (PhD) करने के अपने अनुभवों को भी साझा किया। उन्होंने कहा कि राजनीति में सक्रिय रहते हुए शोध कार्य करना चुनौतीपूर्ण था, लेकिन उन्होंने नकल या शॉर्टकट से बचने का संकल्प लिया।
उन्होंने बताया कि उन्होंने राजनीति विज्ञान में ऐसा विषय चुना, जिसे वे “नींद में भी बता सकें” – भारतीय जनता पार्टी और उसकी पूर्ववर्ती सरकारों का इतिहास। उनके अनुसार, शोध का विषय ऐसा होना चाहिए, जिसमें गहरी समझ और आत्मीय जुड़ाव हो।

मुख्यमंत्री ने चिंता व्यक्त की कि वर्तमान समय में शोध को अत्यधिक “क्लिष्ट” बना दिया गया है। उन्होंने कहा कि शोध का उद्देश्य जटिल शब्दावली या औपचारिकता तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि वह सरल, समझने योग्य और समाजोपयोगी होना चाहिए। उन्होंने शोधार्थियों से आह्वान किया कि वे भारतीय ज्ञान परंपरा से प्रेरणा लेते हुए ऐसे नवाचार करें, जो राष्ट्र निर्माण में सहायक बनें।
कार्यक्रम के समापन अवसर पर मुख्यमंत्री ने सभी विद्वानों, विशेषकर सुरेश जी भाई साहब और महाराज जी के विचारों की प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय शोधार्थी समागम जैसे आयोजन शोध की दिशा और दृष्टि को स्पष्ट करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव का यह संदेश स्पष्ट था कि शोध केवल अकादमिक उपलब्धि नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र के उत्थान का माध्यम होना चाहिए।