नेपाल एक बार फिर राजनीतिक अस्थिरता के दौर से गुजर रहा है। हाल ही में सुशीला कार्की के नेतृत्व में बनी अंतरिम सरकार ने सत्ता संभाली है। यह पहली बार है जब नेपाल को महिला प्रधानमंत्री मिली है। हालांकि, नई सरकार के सामने चुनौतियां भी किसी परीक्षा से कम नहीं हैं। सवाल यही है कि क्या यह सरकार नेपाल में लोकतंत्र की नई लहर लेकर आएगी या फिर संकट को और गहरा करेगी?
आर्थिक मंदी और बेरोजगारी सबसे बड़ी चुनौती
नेपाल की अर्थव्यवस्था फिलहाल गहरी मंदी का सामना कर रही है। युवाओं के पास रोजगार नहीं है, जिसके चलते असंतोष लगातार बढ़ रहा है। रिपोर्ट्स बताती हैं कि अगर इस संकट का समाधान जल्द नहीं निकाला गया, तो देश एक बड़े आर्थिक संकट की तरफ बढ़ सकता है। साथ ही, अंतरिम सरकार के पास सीमित अधिकार होने के कारण नीतिगत फैसले लेना भी मुश्किल हो सकता है।
संवैधानिक उलझनें और राजनीतिक अस्थिरता
अगले छह महीनों में चुनाव कराना अनिवार्य है। लेकिन इस बीच सरकार को संवैधानिक चुनौतियों और विरोध-प्रदर्शनों से भी जूझना होगा। नेपाल के इतिहास को देखें तो 2008 के बाद से कोई भी सरकार अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाई है। बीते 17 सालों में 13 सरकारें बनीं लेकिन स्थिरता नहीं आ सकी। ऐसे में इस अंतरिम सरकार पर दबाव और बढ़ जाता है।
Gen Z का विरोध और उम्मीदें
हालिया Gen Z प्रोटेस्ट ने नेपाल की राजनीति को झकझोर कर रख दिया है। युवाओं ने खुलकर भ्रष्टाचार और बेरोजगारी के खिलाफ मोर्चा खोला। इस आंदोलन में पूर्व प्रधानमंत्री के.पी. शर्मा ओली का घर और पार्टी ऑफिस तक जला दिए गए। शेर बहादुर देउबा और पुष्प कमल दाहाल (प्रचंड) जैसे नेताओं की राजनीतिक छवि भी प्रभावित हुई। अब यही युवा पीढ़ी नई सरकार से पारदर्शिता और रोजगार की उम्मीद लगाए बैठी है। लेकिन अगर उम्मीदें टूटती हैं, तो आंदोलन दोबारा भड़क सकता है।
सुरक्षा व्यवस्था और भ्रष्टाचार की जांच
वर्तमान में नेपाल में सेना तैनात है और जगह-जगह बख्तरबंद वाहन दिखाई देते हैं। लेकिन सेना हटने के बाद सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखना सरकार के लिए बड़ी चुनौती होगी। इसके अलावा भ्रष्टाचार की जांच एक और बड़ा मुद्दा है। जनता चाहती है कि पूर्व मंत्रियों की अवैध संपत्ति की जांच निष्पक्ष तरीके से हो।
राजनीतिक भविष्य का मोड़
नेपाल की नई सरकार का सफर आसान नहीं है। यह सरकार लोकतंत्र की मजबूती का प्रतीक बन सकती है, अगर यह आर्थिक संकट से निपटे, रोजगार सृजित करे और पारदर्शिता लाए। वहीं, यदि यह असफल रहती है तो देश और गहरे संकट में फंस सकता है।