Uttrakhand News: उत्तरकाशी के श्री विश्वनाथ संस्कृत महाविद्यालय में संस्कृत सप्ताह व संस्कृत दिवस का विशेष आयोजन किया गया।इस दौरान छात्रों का यज्ञोपवीत संस्कार का आयोजन भी किया गया। इसमें करीब 125 छात्रों का विधि-विधान के साथ यज्ञोपवीत संस्कार संपन्न करवाया गया।
यज्ञोपवीत के इस कार्यक्रम में संस्कृत सहायक निदेशक पूर्णानंद भट्ट बतौर मुख्य अतिथि के रुप में शामिल हुए।इस दौरान प्राचार्य डॉ. द्वारिका नौटियाल व प्रधानाचार्य मध्यमा स्तर जगदीश उनियाल की उपस्थिति में आचार्यों द्वारा वैदिक मंत्रोच्चार के साथ छात्रों का यज्ञोपवीत संस्कार संपन्न कराया गया। इसके लिए छात्रों को यज्ञोपवीत व भगवा वस्त्र धारण करवाए गए।
दरअसल, छात्रों को मंदिर में पूजा-अर्चना कर वैदिक मंत्रोच्चारण के साथ मंदिर की तीन परिक्रमा पूरी करने के साथ यज्ञोपवीत संस्कार संपन्न करवाया गया। इस दौरान प्राचार्य डॉ. द्वारिका नौटियाल ने बताया कि हिन्दु धर्म के 16 संस्कारों में इस संस्कार को भी सबसे महत्वपूर्ण माना गया है।
ब्राह्मण कुल में 8 से 12 आयु तक और क्षत्रिय में 12 से 16 तक तथा अन्य वर्गों में 16 वर्ष की आयु के यह संस्कार संपन्न करवाना बेहद जरूरी है।
महाविद्यालय में प्रतिवर्ष सामूहिक रूप से यह संस्कार निशुल्क रूप से संपन्न करवाया जाता है, यह संस्कार गुरुकुल की परंपराओं का निर्वहन करते हुए वैदिक मंत्रोच्चारों से प्रक्रियाएं संपूर्ण की जाती हैं।
प्रचार्य ने बताया कि बुरे संस्कारों का नाश कर अच्छे संस्कारों को स्थाई बनाने के लिए यज्ञोपवीत-संस्कार किया जाता है। हिन्दु पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, यज्ञोपवीत संस्कार हुए बिना द्विज यानी कि दूसरा जन्म, किसी कर्म का अधिकारी नहीं होता।
यज्ञोपवीत धारम करने के बाद ही बालक को धार्मिक कार्य करने का अधिकार मिलता है। व्यक्ति को यज्ञ करने का अधिकार प्राप्त हो जाना का अर्थ ही यज्ञोपवीत कहलाता है। पदम् पुराण के अनुसार करोड़ों जन्मों के पाप इत्यादि यज्ञोपवीत धारण करने से नष्ट हो जाते हैं।
हिंदू मान्यताओं के अनुसार, आयु, बल, बुद्धि और संपत्ति की वृद्धि को बढ़ाने के लिए यज्ञोपवीत धारण करना बहुत जरूरी है। इसे धारण करने से कर्तव्य का पालन करने की भी प्रेरणा मिलती है।
This post is written by PRIYA TOMAR