1. हिन्दी समाचार
  2. Burhanpur
  3. बुरहानपुर में 220 साल पुरानी श्रीमद्भागवत आज भी सुरक्षित, रोज होती है पूजा-अर्चना

बुरहानपुर में 220 साल पुरानी श्रीमद्भागवत आज भी सुरक्षित, रोज होती है पूजा-अर्चना

बुरहानपुर के श्री गोकुल चंद्रमाजी मंदिर में करीब 220 वर्ष पुरानी हस्तलिखित श्रीमद्भागवत महापुराण आज भी सुरक्षित है। संवत 1862 में संस्कृत भाषा में लिखी गई इस दुर्लभ पांडुलिपि की रोज पूजा-अर्चना की जाती है और यह भारतीय संस्कृति व धार्मिक विरासत का अनमोल प्रतीक बनी हुई है।

By: Nivedita 
Updated:
बुरहानपुर में 220 साल पुरानी श्रीमद्भागवत आज भी सुरक्षित, रोज होती है पूजा-अर्चना

बुरहानपुर: ऐतिहासिक और धार्मिक विरासत के लिए प्रसिद्ध बुरहानपुर शहर में भारतीय संस्कृति और आस्था से जुड़ी एक अनमोल धरोहर आज भी सुरक्षित है। शहर के प्राचीन श्री गोकुल चंद्रमाजी मंदिर में करीब 220 वर्ष पुरानी हस्तलिखित श्रीमद्भागवत महापुराण को संरक्षित रखा गया है। संस्कृत भाषा में लिखी गई यह दुर्लभ पांडुलिपि धार्मिक महत्व के साथ-साथ प्राचीन ज्ञान परंपरा का भी महत्वपूर्ण प्रमाण मानी जाती है।

संवत 1862 में लिखी गई दुर्लभ पांडुलिपि

मंदिर में सुरक्षित इस श्रीमद्भागवत ग्रंथ के अंतिम पृष्ठ पर संवत 1862 अंकित है। वर्तमान संवत के आधार पर इसकी आयु लगभग 220 वर्ष मानी जाती है। करीब 2 फीट लंबे इस प्राचीन ग्रंथ को पांडुलिपि शैली में संस्कृत भाषा में लिखा गया है। यह ग्रंथ केवल धार्मिक पुस्तक नहीं, बल्कि भारतीय साहित्य, संस्कृति और आध्यात्मिक ज्ञान की पुरानी परंपरा का जीवंत दस्तावेज भी है।

प्रतिदिन होती है विधि-विधान से पूजा

श्री गोकुल चंद्रमाजी मंदिर में इस प्राचीन श्रीमद्भागवत की आज भी नियमित रूप से पूजा-अर्चना की जाती है। मंदिर परंपरा के अनुसार ग्रंथ को श्रद्धा के साथ पूजित किया जाता है और प्रतिदिन भोग भी लगाया जाता है। मंदिर से जुड़े लोगों का मानना है कि श्रीमद्भागवत के प्रत्येक श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण का संदेश और आध्यात्मिक ऊर्जा समाहित है। यही कारण है कि इस ग्रंथ को केवल पुस्तक नहीं, बल्कि आस्था के प्रतीक के रूप में संरक्षित किया गया है।

भागवत कथा परंपरा को आगे बढ़ा रहा मंदिर परिवार

मंदिर से जुड़े भागवत भूषण हरिकृष्ण मुखिया जी ने अपने जीवनकाल में 301 बार श्रीमद्भागवत कथाओं का वाचन किया। वर्तमान में उनके पुत्र आदित्य मुखिया जी इस प्राचीन ग्रंथ की सेवा और संरक्षण की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। मंदिर परिवार का कहना है कि नई पीढ़ी को भारतीय संस्कृति और धार्मिक ग्रंथों के महत्व से परिचित कराना आवश्यक है।

 

योगिनी एकादशी पर श्रीमद्भागवत का विशेष महत्व

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार योगिनी एकादशी को पापों का नाश करने वाली तिथि माना जाता है। इसी भावना से श्रीमद्भागवत को भी पवित्र और जीवन मार्गदर्शन देने वाला ग्रंथ माना जाता है। श्रद्धालुओं के लिए यह प्राचीन पांडुलिपि आस्था और भक्ति का विशेष केंद्र बनी हुई है।

प्राचीन पांडुलिपियों के संरक्षण की दिशा में प्रयास

देशभर में मौजूद ऐतिहासिक पांडुलिपियों के संरक्षण के लिए डिजिटल माध्यमों पर भी काम किया जा रहा है। ऐसी धरोहरों को सुरक्षित रखने से शोधकर्ताओं, विद्यार्थियों और आने वाली पीढ़ियों को भारतीय ज्ञान परंपरा को समझने का अवसर मिलता है।

बुरहानपुर की सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक

220 वर्ष पुरानी यह श्रीमद्भागवत बुरहानपुर की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान को और मजबूत करती है। दो सदियों से अधिक समय से सुरक्षित यह ग्रंथ आज भी श्रद्धा, सेवा और सनातन परंपरा का जीवंत प्रतीक बना हुआ है। यह आस्था, इतिहास और संस्कृति के अनोखे संगम के रूप में लोगों को आकर्षित कर रहा है।

 

रिपोर्ट – राजू सिंह राठौड़ 

इन टॉपिक्स पर और पढ़ें:
Hindi News से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फेसबुक, यूट्यूब और ट्विटर पर फॉलो करे...