इस बार का धनतेरस बेहद ही ख़ास होने वाला है। आपको बता दे, कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि पर धनतेरस के साथ पांच दिवसीय दीपोत्सव यानि दिवाली के पर्व का आंरभ हो जाता है जो भाई दूज तक चलता है
आयुर्वेद के नजरिये से देखा जाए तो इस दिन भगवान् धन्वंतरि अवतरित हुए थे जिन्हे आयुर्वेद का जनक माना जाता है। कार्तिक मास की कृष्ण त्रयोदशी तिथि 12 नवंबर दिन गुरुवार को रात 9:30 पर आरंभ हो जाएगी जो 13 नवंबर दिन शुक्रवार को शाम 5:59 बजे तक रहेगी। त्रयोदशी तिथि के उदया तिथि और प्रदोष काल में होने की वजह से 13 नवंबर दिन शुक्रवार को धनतेरस का पर्व मनाना शुभ रहेगा।
दरअसल, धनतेरस पर भगवान धनवंतरी, मां लक्ष्मी और कुबेर भगवान की पूजा की जाती है। इस दिन नया सामान खरीदने की परंपरा है क्योंकि मान्यता है कि इस दिन जो भी सामान घर में लेकर आते हैं, उसमें तेरह गुना वृद्धि होती है। लोगों का यह मत है की इस दिन वो जो भी खरीदते है उससे घर में स्थायित्व बना रहता है। लोग इस दिन चांदी के सिक्के भी लेते है।
भगवान धनवंतरी की धातु पीतल मानी गई है, इसलिए धनतेरस पर पीतल के बर्तन खरीदना बहुत शुभ माना जाता है। इस दिन लोग पीतल के बर्तन खरीदते है और अपने घरों में उसे इस्तेमाल करते है। इसका अलावा सोना चांदी के बर्तन खरीदने का भी विधान है।
आपको यह भी बता दे कि इस बार की धनतेरस शुक्रवार को पड़ रही है। शुक्रवार का दिन मां लक्ष्मी का प्रिय दिन है। जो मां लक्ष्मी की पूजा करने और उनको मनाने के लिए बेहद खास होता है, इसलिए अगर आप किसी भी चीज की खरीदारी करते हैं तो वह सुख-समृद्धि लाने वाली होगी। धनतेरस के दिन चित्रा नक्षत्र, आयुष्मान योग है जो कि बहुत ही शुभ है। आयुष्मान नक्षत्र में धनवंतरी भगवान की पूजा करने से आरोग्यता का प्राप्ति होगी सभी रोग-दोष नष्ट हो जाएंगे।
आपको बता दे की धनतेरस मनाने के पीछे भी एक पौराणिक कथा है। भगवान् धन्वंतरि स्वयं भगवान् विष्णु का अंश है। दरअसल भगवान धन्वन्तरि का प्राकट्यपर्व कार्तिक कृष्णपक्ष त्रयोदशी माना जाता है। एक बार महर्षि दुर्वासा के साथ देवराज इंद्र ने गलत आचरण कर दिया था जिसके कारण उन्होंने तीनों लोकों को श्रीहीन होने का श्राप दे दिया था।
इसके बाद सभी देवता ब्रह्मा विष्णु महेश के पास गए और इसका समाधान पूछा। उन्होंने कहा की देवता और असुरो को साथ मिलकर समुद्र मंथन करना होगा क्यूंकि ये किसी एक के बस ही बात नहीं है। इसके बाद समुद्र मंथन शुरु हुआ।
मंदराचल पर्वत को मथानी और नागों के राजा वासुकी को मथानी के लिए रस्सी बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। स्वयं भगवान् विष्णु कछप अवतार लेकर पर्वत की पीठ बन गए ! मुँह असुरों की और था और पूंछ देवताओं की और थी। इसके बाद चौदहवें रत्न के रूप में स्वयं भगवान धन्वन्तरि प्रकट हुए जो अपने हाथों में अमृतकलश लिए हुए थे। भगवान विष्णु ने इन्हें देवताओं का वैद्य और वनस्पतियों तथा औषधियों का स्वामी नियुक्त किया।
इस दिन इनकी पूजा-आराधना अपने और परिवार के स्वस्थ शरीर के लिए करें क्योंकि, संसार का सबसे बड़ा धन आरोग्य शरीर है। पुराण कहते है कि ” शरीर माध्यम खलु धर्म साधनम् ” यानी की धर्म का पालन वही कर सकता है जिसके पास अच्छा शरीर हो इसलिए निरोगी होना जरुरी है।
समुद्र मंथन की अवधि के मध्य शरद पूर्णिमा को चंद्रमा, कार्तिक द्वादशी को कामधेनु गाय, त्रयोदशी को धन्वंतरी और अमावस्या को महालक्ष्मी का प्रादुर्भाव हुआ। धनतेरस के दिन भगवान् धन्वंतरि की पूजा करनी चाहिए और उनसे प्रार्थना करनी चाहिए की वो हमे आजीवन निरोगी रखे।