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कांग्रेस की क़यादत- उत्तर प्रदेश की सियासत..

उत्तर प्रदेश समेत मुल्क की पांच रियासतों में 2022 में होने वाले विधान सभा चुनाव की तैयारियां शुरू हो चुकी हैं। सत्ता में बैठी भाजपा भी पूरी ताक़त झोंक रही है। विपक्ष की भूमिका में समाजवादी पार्टी , बहुजन समाज पार्टी , कांग्रेस के अलावा छोटी छोटी पार्टियां भी सियासी उछल कूद कर रही हैं।

By RNI Hindi Desk 
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डॉ मुमताज़ आलम रिज़वी

उत्तर प्रदेश समेत मुल्क की पांच रियासतों में 2022 में होने वाले विधान सभा चुनाव की तैयारियां शुरू हो चुकी हैं। सत्ता में बैठी भाजपा भी पूरी ताक़त झोंक रही है। विपक्ष की भूमिका में समाजवादी पार्टी , बहुजन समाज पार्टी , कांग्रेस के अलावा छोटी छोटी पार्टियां भी सियासी उछल कूद कर रही हैं। 2022 के विधान सभा चुनाव में सियासत का ऊँट किस करवट बैठेगा कहना मुश्किल है लेकिन उत्तर प्रदेश की सियासत में कांग्रेस की क़यादत अब भी काफ़ी पीछे नज़र आ रही है। हालंकि यह सच्चाई है कि 2017 के विधान सभा और 2019 के लोकसभा चुनाव में मिली हार के बाद से कांग्रेस की जनरल सेक्रटरी और उत्तर प्रदेश कांग्रेस की इंचार्ज प्रियंका गांधी लगातार मेहनत कर रही हैं। मुस्लिम मसाइल पर जब सब खामोश हैं तो प्रियंका गांधी उनके लिए खड़ी नज़र आती हैं। वो दलितों और महिलाओं के मसाइल को पूरी शिद्दत से उठा रही हैं। राज बब्बर जैसे लीडर और एक्टर को हटाकर उत्तर प्रदेश का सदर अजय कुमार लल्लू को बनाया। मुस्लिम नौजवानों को आकर्षित करने के लिए मशहूर गले बाज़ शायर इमरान प्रतापगढ़ी को राष्ट्रीय अल्पसंख्यक कांग्रेस का सदर बनाया। इन सबके बावजूद कांग्रेस को यह बात मालूम है कि इस बार भी वो बहुत अच्छा नहीं करने जा रही है। अगर किसी पार्टी के साथ समझौता होता है तो शायद बात बन जाए वरना दस सीटों पर भी कामयाबी के फ़िलहाल लाले पड़े हुए हैं। बीच बीच यह ख़बर भी गर्दिश करती रही है कि शायद भाजपा से नाराज़ वरुण गांधी अपनी बहन प्रियंका गांधी का साथ देने के लिए कांग्रेस में आ जाएँ लेकिन फ़िलहाल यह भी दूर की कौड़ी ही मालूम हो रही है। इसकी सबसे बड़ी वजह कांग्रेस की क़यादत है। जब से राहुल गाँधी ने कांग्रेस के अध्यक्ष पद से इस्तीफ़ा दिया है तब से बार बार और बारी बारी सवाल उठ रहे हैं। इस दौरान जी 23 के नाम से कॉग्रेस में बाग़ी लीडरों का एक समूह भी कांग्रेस में पैदा हो गया। यह लीडर पहली बार उस वक़्त सामने आये जब कांग्रेस की सदर सोनिया गांधी को भेजा गया ख़त मीडिया के ज़रिये मंज़र ए आम पर आ गया। इसमें पहली बार क़यादत का मसला उठाया गया और अध्यक्ष के लिए चुनाव कराये जाने की मांग की गई। दर असल बात यह है कि राहुल गांधी सिर्फ़ कहने के लिए अध्यक्ष नहीं हैं वरना सारे फ़ैसले उनकी मर्ज़ी से ही हो रहे हैं। पिछले दिनों इस पर कांग्रेस के सीनियर लीडर कपिल सिब्बल ने सवाल उठाया था और कहा था की बग़ैर सदर के कांग्रेस चल रही है। हालांकि बाद में वर्किंग कमिटी में सोनिया गांधी ने जी 23 के लीडरान को  जमकर फटकार लगाई थी और कहा था कि मैं हूँ कांग्रेस की मुकम्मल सदर। सोनिया गांधी ने लीडरान की ज़बान तो यक़ीनन बंद कर दी  लेकिन सौ टके का सवाल अब भी बाक़ी है कि जब सारे फ़ैसले राहुल गाँधी ले रहे हैं तो ज़िम्मेदारी से क्यों भाग रहे हैं? अब इस रौशनी में उत्तर प्रदेश की सूरत ए हाल  देख लीजिये। उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी का सीएम चेहरा अखिलेश यादव हैं। बहुजन समाज पार्टी का सीएम चेहरा मायावती हैं। भाजपा का सीएम चेहरा योगी आदित्यनाथ हैं लेकिन कांग्रेस का सीएम चेहरा कौन होगा कुछ भी साफ़ नहीं है। कांग्रेसी दिल खुश करने के लिए कह देते हैं कि प्रियंका गांधी ख़ुद सीएम का चेहरा हैं लेकिन इस पर आजतक कांग्रेस आला कमान की तरफ़ से कोई बयान नहीं आया। यह सवाल भी उठा कि क्या दलित चेहरा अजय कुमार लल्लू सीएम का चेहरा होंगे तो उस पर भी कॉग्रेस ख़ामोश है। कांग्रेस का एक बड़ा तब्क़ा यह भी मांग कर रहा था कि ब्रह्मण चेहरे के तौर पर आचार्य प्रमोद कृष्णम को लाया जाए। योगी को अगर कोई टक्कर दे सकता है तो यही चेहरा है क्यूंकि आचार्य जी की जितनी पकड़ हिन्दुओ में है उतनी पकड़ मुस्लिम में भी है। अगर इनको चेहरा बनाया गया तो कॉग्रेस की नैया पार लग सकती है  लेकिन कांग्रेस ने इस मांग को भी नज़र अंदाज़ कर दिया। शायद यह सब इस लिए है की कांग्रेस ख़ुद अपनी क़यादत में उलझी है। कांग्रेस अब भी नहीं समझ पा रही है कि प्रियंका गांधी को उत्तर प्रदेश के सियासी रेगिस्तान में उतार कर अच्छा किया या बुरा किया ? क्यूंकि भविष्य में अगर कांग्रेस को किसी से उम्मीद है तो वो प्रियंका गांधी हैं। उत्तर प्रदेश की सियासत में वो क्या कर पाएंगी यह तो समय बताएगा लेकिन अगर क़यादत का मसला हल न हुआ और फ़ैसले लेने में ग़लती की गई तो सारी मेहनत पर पानी फिर जायेगा।

सीनियर एडिटर, आर एन आई न्यूज़

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