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जन-स्वीकृति वाला व्यक्तित्व है प्रियंका गांधी

Priyanka Gandhi is a popular personality... प्रियंका फैक्टर लोकतांत्रिक राजनीति की जरूरत है।एक और इंदिरा गांधी की संभावनाओं को खुद गांधी परिवार ने ही धराशाई कर दिया। वह भी समय था जब प्रियंका गांधी में इंदिरा गांधी की छवि देखी जा रही थी। राजनीतिक परिपक्वता, सामाजिक धैर्यता, विनम्रता और सरलता के साथ वैचारिक दृढ़ता का समावेश प्रियंका को इंदिरा गांधी की छवि के करीब ला रहा था।

By: RNI Hindi Desk 
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जन-स्वीकृति वाला व्यक्तित्व है प्रियंका गांधी

रिपोर्ट:प्रभात रंजन दीं की कलम से

 

राजीव गांधी की असामयिक मृत्यु के बाद सोनिया गांधी के प्रधानमंत्री बनने के रास्ते में उनके विदेशी होने का वितंडा खड़ा हुआ तब सोनिया ने मनमोहन सिंह का नाम प्रस्तावित कर खुद को प्रधानमंत्री पद से अलग कर लिया। लेकिन उसके बाद सोनिया ने राहुल गांधी को भविष्य के प्रधानमंत्री के रूप में आगे लाने पर पूरा ध्यान लगा दिया। सोनिया के पुत्र प्रेम में पुत्री प्रियंका वृष्टिछाया-क्षेत्र में चली गई। सक्रिय राजनीति से प्रियंका को बिल्कुल अलग रख कर राहुल को राजनीतिक परिदृश्य में इकलौता खड़ा करने का सोनिया का जतन कामयाब नहीं हुआ। कांग्रेस की हालत दिन प्रतिदिन खस्ता होती चली गई। आखिरकार सोनिया को अपनी भूल का एहसास हुआ और प्रियंका को राजनीति में सक्रिय किया गया। प्रियंका गांधी की राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार्यता है, लेकिन उन्हें यूपी-केंद्रित किया गया। क्योंकि सोनिया को अब भी लग रहा है कि राहुल का राष्ट्रीय व्यक्तित्व बनेगा और वे प्रधानमंत्री के रूप में देखे जाएंगे। बहरहाल, प्रियंका को उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनाए जाने के पहले जो कांग्रेस पार्टी मृतप्राय स्थिति में थी, प्रियंका के आने से कांग्रेस अचानक जाग्रत हो गई। प्रियंका की सक्रियता का ही असर है कि यूपी विधानसभा चुनाव के पहले मतदाताओं के बीच कांग्रेस को गंभीरता से लिया जाने लगा है।

चुनावी मौसम में पार्टी का घोषणा-पत्र जारी करते हुए प्रियंका गांधी ने कहा कि देश में युवाओं को बहकाने की राजनीति हो रही है जबकि असली राजनीति युवाओं को सकारात्मक रास्ते पर लाने की होनी चाहिए। ‘घोषणा-पत्र’ को ‘भर्ती-विधान’ कहा गया, जिसके जरिए युवकों को रोजगार देने के उपाय सुझाए गए हैं और युवकों को सकारात्मक राह दिखाने की बातें कही गई हैं। ‘भर्ती-विधान’ पर प्रियंका गांधी ने कहा, ‘यूपी में जहां भी जाती हूं, युवाओं के यही मुद्दे हैं कि युवाओं के लिए आप क्या करेंगी? भर्तियों में युवक अपना समय खर्च करते हैं, मां बाप पैसे खर्च करते हैं, छात्र मेहनत करते हैं, लेकिन नियुक्तियां नहीं हो रही हैं। कभी घोटाला हो जाता है, कभी पेपर लीक हो जाता है, कभी पासिंग ग्रेड बदल दिया जाता है। इस तरह छात्र प्रताड़ित हो रहे हैं। सबसे ज्यादा नौजवान यूपी में हैं। हर जगह नौजवान मुझसे पूछते हैं कि दीदी रोजगार के लिए क्या करेंगे, हमारा विकास नहीं हो रहा है, हमारे लिए सरकार क्या करेगी? मैं ऐसे छात्रों से मिलती हूं, जिन्होंने अपने जीवन के पांच साल, सात साल सरकारी नौकरी की तैयारी में निकाल दिए। नियुक्तियां नहीं हो रही हैं, पेपर लीक हो रहा है, घोटाला हो जाता है। इसलिए हमने नौजवानों के लिए एक अलग विधान बनाया। ‘भर्ती-विधान’ में हमने बताया कि हम 20 लाख नौकरियां कैसे देंगे। अगर एक नौजवान अपना बिजनेस शुरू करना चाहता है, तो उसकी सहायता कैसे करेंगे। नौकरियों की जो हालत है, उसे लेकर यूपी में युवाओं का मानसिक स्वास्थ्य कैसे सही रहे, इसके लिए भी हमने प्रावधान किए हैं।’

भाजपा पर निशाना साधते हुए प्रियंका ने कहा, ‘कांग्रेस बार-बार कह रही है कि जातिवाद और सांप्रदायिक राजनीति से जनता का विकास नहीं होगा, लोगों को रोजगार नहीं मिलेगा। जो लोग 70 साल की बात कर रहे हैं, उन्हें पता होना चाहिए कि आईआईटी, एम्स जैसे संस्थान कांग्रेस ने ही बनाए हैं। बीते साल साल में भाजपा सरकार ने बनाया तो कुछ नहीं, हां बेचा जरूर है। अब रेलवे का प्राइवेटाइजेशन करेंगे तो नौकरियां ख़त्म होंगी ही। लोकतंत्र में सबसे बड़ी शक्ति युवाओं के हाथ में ही है, उस शक्ति को युवा ठीक से समझेंगे और उसका उपयोग करेंगे तभी आगे बढ़ पाएंगे। देश में ऐसी राजनीति फैल रही है, जो युवाओं को बहकाने का काम कर रही है। चुनाव के समय बात होनी चाहिए कि नौकरी कहां से देंगे, युवाओं, बच्चों की शिक्षा के लिए क्या करेंगे। भाजपा चुनाव के समय रोजगार की बात इसीलिए नहीं करती है क्योंकि न तो उसने कुछ किया और न ही उसका कुछ करने का इरादा है। प्रयागराज में मैं निषादों से मिली, तो पता चला कि नदी पर जो अधिकार होता था निषादों का, या उनको रोजगार मिलता था, अब उसपर उनका हक़ नहीं है। यूपी में नेता जान रहे हैं कि लोग पानी, नल, सड़क, विद्यालय की स्थिति को देखकर नहीं बल्कि जाति के आधार पर वोट दे रहे हैं। तो वह विकास की बातें क्यों करेंगे क्योंकि उन्हें पता कि वोट उन्हें मिलना है और जहां से वोट नहीं मिलने हैं, वहां डरा धमकाकर वोट मिल जाएगा।’

प्रियंका ने कहा, ‘मुझे समझ नहीं आता है कि भाजपा सरकार को छात्रों से, अभ्यर्थियों से बात करने में क्या परेशानी है। इंदिरा जी के समय में जेएनयू में छात्र आंदोलन हुआ, वह छात्रों से मिलने गईं, वहां के छात्र संघ अध्यक्ष ने उन्हें अपनी मांगें पढ़कर सुनाईं कि आप इस्तीफ़ा दो, आपको कुलाधिपति नहीं होना चाहिए। इंदिरा जी ने जेएनयू के कुलाधिपति पद से इस्तीफा दे दिया। लेकिन आज सरकार क्या कर रही है? छात्रों को धमकाया जा रहा है, पीटा जा रहा है, छात्रसंघ के चुनाव बंद कर दिए हैं। अहंकार से ग्रस्त इस सरकार को समझ नहीं आ रहा कि युवाओं को रोजगार देकर आप अहसान नहीं कर रहे बल्कि यह आपकी ड्यूटी है। युवा जब हक मांगते हैं, तो उन्हें पीटा जाता है। कांग्रेस के ‘भर्ती-विधान’ में हमने इसीलिए जॉब-कैलेंडर बनाने की बात की है, ताकि समय से भर्तियां सुनिश्चित की जा सकें। इसके उल्लंघन पर कार्रवाई के लिए हमने कानून बनाने की बात की है। साथ ही विशेष भर्ती आयोग बनाया जाएगा, जो पुराने लंबित मामलों में समाधान पेश करेगा।’

प्रियंका गांधी ने कहा कि सरकार की जिम्मेदारी है युवाओं को सशक्त करना। आज का युवा मुफ्त में बैठकर नहीं खाना चाहता बल्कि कुछ करना चाहता है। कोई नहीं चाहता कि बस राशन दे दो, इससे युवा का भविष्य नहीं बनेगा। भाजपा सरकार नहीं चाहती है कि युवा सशक्त बनें। युवाओं के लिए मुद्दा रोजगार होना चाहिए, लेकिन धर्म के नाम पर एक पूरी पीढ़ी को बर्बाद किया जा रहा है। युवाओं को बेरोजगार रखने से कुछ राजनीतिक दलों को फायदा हो रहा है। नकारात्मक राजनीति करने वाले लोग युवाओं के गुस्से का फायदा उठाते हैं। उन्होंने कहा, ‘छत्तीसगढ़ में हमारी सरकार आई तो शपथग्रहण के दो घंटे के अंदर किसानों का कर्ज माफ किया गया। इसी तरह यूपी में हमारी सरकार आएगी तो कर्ज माफी और खाली पद भरने के निर्णय तुरंत लिए जाएंगे। सरकार बड़े-बड़े विज्ञापनों में पैसा खर्च कर रही है। अखबार के एक पृष्ठ का विज्ञापन लाखों का होता है। अगर वही पैसे ढंग से इस्तेमाल हों तो बड़ी संख्या में रोजगार पैदा होंगे। ऐसा नहीं है कि सरकार के पास पैसे नहीं हैं। उसका इस्तेमाल सही नहीं हो रहा है। जनता को सरकार को जवाबदेह बनाना होगा।’

इंदिरा जी का बार-बार हवाला देने वाली प्रियंका, लोगों को अपने इंदिरा के स्वरूप का एहसास भी कराती हैं। इस स्वरूप का एहसास करते हुए लोग प्रियंका को राजनीति से काट कर अलग रखने की बातें भी साथ-साथ याद करते हैं। लोगों में यह चर्चा का विषय है कि प्रियंका ने सोनिया और राहुल को जितवाने के लिए अमेठी और रायबरेली में अपनी खास पहचान बना ली थी, लेकिन सोनिया ने प्रियंका को पॉलिटिकल-मैनेजर से अधिक नहीं बनने दिया। सक्रिय राजनीति में प्रियंका वर्ष 2019 में आईं, जब सोनिया के पास इसके अलावा कोई रास्ता नहीं बचा था। बौद्ध दर्शन का पालन करने वाली प्रियंका महिलाओं, युवाओं और दलितों के बीच खासा लोकप्रिय हैं। प्रियंका कहती भी हैं कि उनके लिए राजनीति का मतलब है जनता की सेवा करना और वह यह काम सक्रिय राजनीति में आने से पहले से कर रही हैं। प्रियंका गांधी अपनी मां सोनिया गांधी और भाई राहुल गांधी की मदद में उनके लिए चुनाव प्रचार करती और चुनाव प्रबंधन संचालित करती दिखाई देती रही हैं, लेकिन उन्होंने खुद चुनाव लड़ने और कुर्सी पाने की लालच कभी नहीं दिखाई। और न सोनिया ने इस पर कोई ध्यान दिया। 23 जनवरी 2019 को प्रियंका गांधी के सक्रिय राजनीति में शामिल होने के पीछे तमाम पार्टी अध्यक्षों और नेताओं की समवेत मांग भी प्रमुख वजह रही है। कांग्रेस पार्टी ने उन्हें महासचिव बना कर उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनाया और खास तौर पर पूर्वी उत्तर प्रदेश को दुरुस्त करने का दायित्व सौंपा।

राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि प्रियंका गांधी कांग्रेस के लिए तुरुप का इक्का साबित हो सकती थीं, लेकिन बेटे राहुल के कारण सोनियां गांधी ने बेटी प्रियंका की तरफ कोई ध्यान ही नहीं दिया। जबकि एक लंबे अर्से से लोगों और कांग्रेस के नेताओं की नजर प्रियंका पर टिकी थी। लेकिन वह भी समय था, जब प्रियंका का नाम लेने वाले नेताओं के कांग्रेस में पर काट डाले जाते थे। लखनऊ की आला हस्ती पूर्व केंद्रीय मंत्री अखिलेश दास उनमें से एक प्रमुख नाम है। कांग्रेस के नेताओं को यह उम्मीद थी कि प्रियंका के सक्रिय राजनीति में आने से विरोधी दलों का झटका लगेगा, लेकिन कांग्रेस नेतृत्व ने इस बंदूक से फायर करने में देरी कर दी। गांधी परिवार का गढ़ रहे अमेठी-रायबरेली में से एक सीट कांग्रेस को गंवा देनी पड़ी और राहुल गांधी को अमेठी से भाग कर केरल में शरण लेनी पड़ी। देर से ही सही, लेकिन अब उत्तर प्रदेश की कमान प्रियंका गांधी के हाथ में है। यह भी चर्चा है कि अगर कांग्रेस को अपनी स्थिति मजबूत दिखाई पड़ी तो प्रियंका भी विधानसभा का चुनाव लड़ें। प्रियंका के चुनाव लड़ने का मतलब होता है, यूपी के मुख्यमंत्री के रूप में उनके चेहरे को आगे करना। अगर ऐसा होता है तो यह निश्चित तौर पर कांग्रेस के लिए भी फायदेमंद साबित होगा और उत्तर प्रदेश की राजनीति के लिए भी हितकारी रहेगा। दूसरा पहलू यह भी है कि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस अगर संतोषजनक प्रदर्शन नहीं करती है तो प्रियंका को कहीं पैविलियन वापस न लौटना पड़े। हालांकि प्रियंका ने काफी सोच-समझ कर प्रत्याशी तय किए हैं। टिकट वितरण में महिलाओं और दलितों को प्राथमिकता देकर प्रियंका ने राजनीतिक परिपक्वता का परिचय दिया है। महिलाओं को विशेष महत्व देने की योजना के तहत ही प्रियंका ने ‘लड़की हूं, लड़ सकती हूं’ का बहुचर्चित कैंपेन भी चलाया। प्रियंका सार्वजनिक मंचों से यह कह रही हैं कि महिलाओं को अगर राजनीतिक रूप से सशक्त बनाना है तो गैस सिलेंडर या कुछ पैसे देने से काम नहीं चलेगा। उन्हें बराबरी देनी होगी।

प्रियंका गांधी की राजनीतिक परिपक्वता का अंदाजा उनकी इस बात से ही लग जाता है कि वे सैद्धांतिक तरीके से समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी की सियासत को खारिज करती हैं। प्रियंका समाजवादी पार्टी का नाम लिए बगैर कहती हैं, ‘भाजपा को रोकने के लिए आपको एक ऐसी पार्टी की जरूरत है जो ध्रुवीकरण का एक और हिस्सा बनने के बजाय विमर्श को बदले।’ प्रियंका कहती हैं कि विभाजनकारी बयानबाजी से सबसे ज्यादा फायदा भाजपा को होगा, यह पार्टियां क्यों नहीं समझती हैं! चुनाव तो विकास, रोजगार, नौकरियों के सृजन, स्वास्थ्य सेवा और शिक्षा के मुद्दों पर लड़ा जाना चाहिए, लेकिन इसका ठीक उल्टा हो रहा है। प्रियंका ने यह स्पष्ट कहा है कि उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी और समाजवादी पार्टी दोनों को ध्रुवीकरण पसंद है क्योंकि इसके जरिये दोनों पार्टियां अपने वोट आधार को मजबूत बनाती हैं। ऐसे में लोगों को दूसरी तरह की ऐसी राजनीति का विकल्प देने की जरूरत है जो समाज को धर्म और जाति के आधार पर न बांटती हो।

लब्बोलुबाव यह है कि कांग्रेस पार्टी हो या कोई अन्य राजनीतिक दल, सब चुनाव में हार या जीत से किसी नेता की प्रतिभा और प्रभाव आंकने लगते हैं, यूपी के विधानसभा चुनाव के बाद भी यही होने वाला है। प्रियंका को यूपी चुनाव की टिकटिकी पर चढ़ा कर उन्हें हाइबरनेशन में फिर से भेजने का यह कुचक्र भी हो सकता है। लेकिन यह देश की राजनीति के लिए अच्छी बात नहीं होगी। प्रियंका का सक्रिय राजनीति में रहना भारत में लोकतंत्र को जिंदा रखने के लिए जरूरी है। यह बात इसलिए नहीं है कि वे गांधी परिवार की सदस्या हैं, बल्कि यह बात प्रियंका के स्वतंत्र व्यक्तित्व, विचार और जनता के बीच स्वीकार्यता को लेकर है। इससे क्या फर्क पड़ता है कि विधानसभा चुनाव में कांग्रेस हारे या जीते…

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