इसमें कोई विवाद नहीं है कि, वर्तमान में लोगों के रहन-सहन में काफी विस्तार और विकास हुआ है परंतु हमें यह भी समझना होगा कि आखिर किस तर्ज पर हमें यह विस्तार प्राप्त हुआ है। क्योंकि आज सुरक्षा लोगों के लिए व्यवसाय का एक जरिया बन गया है।
उदाहरण के लिए हवा खराब हो तो बड़ी कंपनियों के एयर क्लीनर ले लीजिए, घर में सफाई और हाइजीन बनाए रखने के लिए फ्लोर क्लीनर ले लीजिए और अगर पानी खराब लगे तो वाटर प्यूरीफायर घर में लगवा लीजिए।
कहने का तात्पर्य है कि सुरक्षा के नाम पर कुछ भी बाजार में बेच लें सब अच्छा ही मान लिया जाएगा और बिना निरीक्षण किए खरीद लिया जाता है।
3 और 4 दिसंबर 1984 के तारीख की वह काली रात जिसने देश की सबसे भीषण औद्योधिक दुर्घटना का जन्म दिया। उस रात पौंधो के लिए पेस्टीसाइड बनाने वाली केमिकल कंपनी यूनियन कार्बाइड कॉर्पोरेशन के कारखाने में एमआईसी नामक जहरीले गैस का रिसाव होने से हजारों लोग हमेशा के लिए मौत की नींद सो गए।
बेशक आठ घंटे के बाद भोपाल को इस गैस से मुक्त मान लिया गया हो लेकिन आज भी इसके जख्म को देखा जा सकता है। आज भी भोपाल त्रासदी के असर से वहाँ के लोगों में कई प्रकार की अपंगता देखने को मिलती है। परंतु दुख इस बात का रहा कि हादसे के मुख्य जिम्मेदारों का सजा नहीं मिल सकी।
गैस का रिसाव होने के कारण लोगों में अफरा-तफरी मच गई। इस अफरा-तफरी में लोगों की मौत और जल्दी होने लगी। क्योंकि यह गैस और जल्दी लोगों के लीबर में जाकर अपना असर दिखाने लगी थी। उस समय जो बंद कमरे में थे उन्हें भी इस गैस ने काफी नुकसान पहुँचाया था, लेकिन फिर भी ये लोग बाहर जान बचाने के लिए भागने वालों से ज्यादा सुरक्षित थे।
रात जैसे-जैसे गहरी होती गई भोपाल के अस्पतालों में भीड़ बढ़ती गयी। वहाँ के डॉक्टरों को अचानक आई भीड़ और तबाही के बारे में पता ही नहीं था कि क्या चल रहा है। इस बीमारी के लिए उनके पास उस समय कोई दवा नहीं थी क्योंकि उन्हें बीमारी ही नहीं पता थी। ऐसें में आंखों में जलन होने वालों के आंखों में आई ड्राप डाल रहे थे पर अन्य बीमारी के लिए उनके पास कोई दवा समझ में नहीं आ रही थी।
दो दिनों के अंदर ही भोपाल के अस्पतालों में 50 हजार से ज्यादा मरीज पहुँचे थे। तो कई की लाश सड़क पर ही पड़ी किसी का इंतजार कर रही थी।
जिस समय भोपाल में गैस त्रासदी हुई उस समय केंद्र और राज्य, दोनों ही स्थानों पर कांग्रेस की सरकार थी। उस समय प्रधानमंत्री के रूप में राजीव गांधी सत्ता को संभाल रहे थे, तो वहीं भोपाल के मुख्यमंत्री के रूप में अर्जुन सिंह अपना कारभार संभाल रहे थे। जब उन्हें गैस त्रासदी की बात पता चली तो उन्होंने भोपाल ले गुजरने वाली सारी ट्रेनों को या तो रद्द कर दिया या रूट डायवर्ट कर दिया।
परंतु भोपाल में केमिकल से घुट रहे लोगों के जान को लेकर यह बात कहकर पल्ला झाड़ लिया कि उन्हें उस बीमारी के बारे में कुछ नहीं पता कि उससे बाहर के संसार को क्या खतरा हो सकता है। इसलिए जब तक रिपोर्ट उस मामले पर नहीं आ जाती है, तब तक वे कुछ नहीं कर सकते हैं और न ही संबंधित विभाग को कुछ करने की इजाजत दे सकते हैं।
ऐसे में न तो गैस त्रासदी के लिए जिम्मेदारों को सजा मिली और न ही पीड़ितों को राहत महसूस कर सकने लायक न्याय या हर्जाना ही मिला। भोपाल की त्रासदी भोपाल के सियासत में मिलकर धूमिल हो गई और फिर एक समय ऐसा आया कि इसपर भी संदेह होने लगा कि यह घटना घटी भी या यह दिमाग का एक भ्रम है। यह बात कड़वी है पर सच है।
बाद में दो दशकों तक बीजेपी सरकार की तरफ से इस मुद्दे को चुनावी मुद्दे के रूप में प्रयोग किया गया। लेकिन इन दो दशकों के बाद धीरे-धीरे इस मुद्दे पर मिट्टी पड़ती गई। वहाँ के लोग खुद इस घटना को भूलते चले गए और अब हालत ये है कि लाखों लोगों के शहर में सव दो सव से ज्यादा लोग नहीं हैं जिन्हें इस बारे में कुछ जानकारी हो।
ऐसें में हम कह सकते हैं कि हमनें इससे न सबक लिया और न ही हादसे को लेकर हमारे अंदर कोई गम ही रह गया है। तो ऐसे में बाहर वाले तो इन लूप होलों का लाभ उठाएं तो कोई हर्ज नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट के चार्जशीट में इस त्रासदा के लेकर 15,724 लोगों का मारे जाने की बात कही गई थी।
इस घटना के बाद यूनियन कार्बाइड कॉर्पोरेशन ने इस दुर्घटना में हुए क्षति के लिए उस समय 470 मिलियन अमेरिकी डॉलर का मुआवजा दिया। परंतु यह मुआवजा क्षति हुए राशि से बहुत कम था। ऐसे में पीड़ितों ने ज्यादा मआवजे के लिए न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। न्यायालय ने पीड़ितों की मांग को जायज ठहराया और यूसीसी के अध्यक्ष (CEO) को दोषी पाया। 6 दिसंबर 1984 को एंडरसन को गिरफ्तार कर लिया गया था।
07 जून को भोपाल की एक आदालत ने 7 अधिकारियों को हादसे के लिए दो साल की सजा सुनाई। UCC के अध्यक्ष वारेन एंडरसन जो कि इस मामले के मुख्य आरोपी थे, मुकदमें के लिए कोर्ट में पेश नहीं हुए। क्योंकि इस घटना के अगले दिन वे भोपाल से प्राइवेट जेट के द्वारा दिल्ली गए और बाद में भारत सरकार के प्राइवेट जेट से उन्हें अमेरिका भेज दिया गया था।
1 फरवरी 1992 को भोपाल की कोर्ट ने फरार या कहें भगोड़ा घोषित कर दिया। एंडरसन के खिलाफ अदालत ने 1992 और 2009 में दो बार गैर-जमानती वारंट जारी किया परंतु एंडरसन की गिरफ्तारी नहीं हो सकी। एंडरसन की स्वाभाविक मौत 29 सितंबर 2014 को फ्लोरिडा के वीरो बीच पर 93 साल की उम्र में हुआ। गैस लीक होने के 8 घंटे का बाद भोपाल को जहरीली गैस से मुक्त मान लिया था लेकिन इसका जखम आज भी मौजूद है।
THIS POST IS WRITTEN BY ABHINAV TIWARI