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क्यों मनाई जाती है गोवर्धन पूजा, जानिए पूजा के पीछे की पौराणिक कथा

By RNI Hindi Desk 
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कार्तिक माह की अमावस के दिन दिवाली का पर्व मनाया जाता है और उसी के ठीक अगले दिन गोवर्धन पूजा की जाती है ,इस पूजा का संबंध सीधे नेचर से है की कैसे आप प्रकृति से जुड़कर जीवन का अर्थ समझ सकते है। इस दिन मंदिरों में नया बाजरा मूली चढ़ाया जाता है और अन्नकूट महोत्सव किया जाता है।

घरों में गोबर से गोवर्धन पर्वत की आकृति बनाई  जाती है। गोवर्धन पर्वत के साथ गाय तथा ग्वाल-बालों की आकृति भी बनाई जाती है। वहीं पर कृष्ण जी को भी विराजमान करके पूजन किया जाता है। मथुरा और वृन्दावन वासियो के लिये तो ये त्यौहार सबसे अधिक महत्वपूर्ण होता है।

गोवर्धन पूजा का शुभ मुहूर्त
तिथि – कार्तिक माह शुक्ल पक्ष प्रतिपदा (15 नवंबर 2020)

गोवर्धन पूजा सायं काल मुहूर्त – दोपहर बाद 15:17 बजे से सायं 17:24 बजे तक
प्रतिपदा तिथि प्रारंभ – 10:36 (15 नवंबर 2020) से
प्रतिपदा तिथि समाप्त – 07:05 बजे (16 नवंबर 2020) तक

गोवर्धन पूजा के संबंध में एक कथा है। जिसके अनुसार भगवान श्रीकृष्ण ने लोगों से इंद्र की पूजा के बजाय गोवर्धन पर्वत की पूजा करने को कहा था हालांकि इससे पहले लोग बारिश के देवता इंद्र की पूजा करते थे।

भगवान कृष्ण ने लोगों को बताया कि गोवर्धन पर्वत से गोकुल वासियों को पशुओं के लिए चारा मिलता। गोवर्धन पर्वत बादलों को रोककर वर्षा करवाता है जिससे कृषि उन्नत होती है। इसलिए गोवर्धन की पूजा की जानी चाहिए न कि इन्द्र की।

जब यह बात देवराज इन्द्र को पता चली तो इसे उन्होंने अपना अपमान समझा और फिर गुस्से में ब्रजवासियों पर मूसलाधार बारिश शुरू कर दी। भगवान श्री कृष्ण ने इंद्र का अभिमान चूर करने के लिए गोवर्धन पर्वत को अपनी छोटी उंगली पर उठाकर संपूर्ण गोकुल वासियों की इंद्र के कोप से रक्षा की थी।

इन्द्र के कोप से बचने के लिए गोकुल वासियों ने जब गोवर्धन पर्वत के नीचे शरण ली तब गोकुल वासियों ने 56 भोग बनाकर श्री कृष्ण को भोग लगाया था। इससे प्रसन्न होकर श्री कृष्ण ने गोकुल वासियों को आशीर्वाद दिया कि वह गोकुल वासियों की रक्षा करेंगे।

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