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नये कृषि कानूनों के आंदोलन में अपनी जान गंवाने वाले किसानों का जिम्मेदार कौन?

By: RNI Hindi Desk 
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नये कृषि कानूनों के आंदोलन में अपनी जान गंवाने वाले किसानों का जिम्मेदार कौन?

रिपोर्ट: सत्यम दुबे

नई दिल्ली: किसान आंदोलन का सोमवार को 54वां दिन है, इस कड़ाके की ठंड में किसान नये कृषि कानून को लेकर सरकार के विराध में आंदोलनरत हैं। इधर सरकार भी किसानों के प्रति संवेदना जता रही है। सरकार और किसानो के बीच लगभग 9 राउंड की वार्ता हो चुकी है, लेकिन अब भी कोई समाधान नहीं निकल सका है। सरकार की तरफ से किसानों को समझाने में केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर और रेल मंत्री पीयूष गोयल महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहें हैं।

जबकि किसानों की बात करें तो किसानों की अगुवाई राकेश टिकैत कर रहें हैं। राकेश टिकैट भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय प्रवक्ता भी हैं। आपको बता दें कि राकेश टिकैट भारतीय किसान यूनियन के पूर्व अध्यक्ष महेंद्र सिंह टिकैट के बेटे हैं। राकेश टिकैट भारतीय किसान यूनियन के साथ अपने विरासत को भी लेकर आगे बढ़ रहें हैं। भारतीय किसान यूनियन उत्तर प्रदेश और उत्तर भारत में किसानों के हित के लिए हमेंसा ही अग्रसर रहा है।

जबकि नये कृषि कानूनों की बात करें तो कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने आंदोलनकारी किसानों से समन्वय बैठाने के साथ-साथ अनुरोध किया है कि कानून रद्द करने की मांग के अलावा इसमें जो भी त्रुटि हो उस त्रुटियों को दूर करने को हम तैयार हैं।

किसान आंदोलन सर्वोच्च न्यायालय के दरवाजे पर भी अपनी दस्तक दे चुका है। जिसमें चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया शरद अरविंद बोबड़े ने किसानों और सरकार के बीच के मतभेद को दूर करने की कोशिश की और एक कमेटी बनाने का आदेश दिया। सर्वोच्च न्यायालय के इस तर्क को भी किसानों ने मानने से इनकार कर दिया। जिसके बाद मामला और उलझता हुआ चला जा रहा है।

सरकार की तरफ से कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने किसानों यह भी कहा कि “भारत सरकार ने किसान यूनियन के साथ एक बार नहीं 9 बार घंटों तक वार्ता की, हमने लगातार किसान यूनियन से आग्रह किया कि वो कानून के क्लॉज पर चर्चा करें और जहां आपत्ति है वो बताएं। सरकार उस पर विचार और संशोधन करने के लिए तैयार है। लेकिन सरकार के इस कदम को राकेश टिकैट ने सिरे से खारिज कर दिया।

जबकि दूसरी तरफ राकेश टिकैट का कहना है कि कानून वापस से कम कुछ भी मंजूर नहीं है। आगे उन्होंने कहा, “क्लॉज पर चर्चा वो करेगा जिसे कानून में संशोधन कराना हो, ये हमारा सवाल है ही नहीं। सरकार को ये तीनों कानून खत्म करने पड़ेंगे। आंदोलन जारी रहेगा। आंदोलन में क़रीब 10 दौर की वार्ता हो चुकी है, सरकार पूर्ण रूप से अड़ियल रुख कर रही है।

किसान आंदोलन के निष्कर्ष को देंखे तो किसान और सरकार के बीच उठे मतभेद से यह साफ जाहिर हो रहा है कि सरकार कानून वापस लेने के मूड में नहीं है, तो दूसरी तरफ किसान और किसान नेता कानून की खामिंयो पर चर्चा करने को तैयार नहीं है। इतना ही नहीं सर्वोच्च न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद भी मामला सुलझता हुआ नहीं दिख रहा है।

ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह खड़ा हो रहा है कि इस कड़ाके की ठंड में अपनी जान दे चुके किसानों की जिम्मेदारी कौन लेगा। इस मसले पर सरकार के विरोध में किसानों के साथ राजनीतिक पार्टियां भी अपनी राजनीति चमकाने में पीछे नहीं हैं।

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