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जहां सभी को मिलता है मोक्ष, वहीं इस परिवार को मिला अंतिम सहारा, लॉकडाउन ने छीन ली थी नौकरी

By Amit ranjan 
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नई दिल्ली : श्मशान घाट में लगातार जलते चिता, अस्पतालों में कोरोना मरीजों की चीख-पुकार, ऑक्सीजन की मारामारी, सड़कों पर उमड़ी बेरोजगारों की भीड़ और लाचार सरकार एवं प्रशासन, जी हां यह दृश्य है वर्तमान भारत का। जो कुछ समय पहले तक लोगों को आत्मनिर्भर होने की बात कह रही थी। लेकिन दुनिया पर आफत बनकर आये कोरोना महामारी ने जहां कई लोगों को बेरोजगार, वहीं उसने उन लोगों के छोटी-मोटी बिजनेस को बंद करवा दिया, जिन्होंने कुछ हिम्मत दिखाकर खुद को आत्मनिर्भर बनाने की कोशिश की थी।

इसी से जुड़ा एक मामला गुजरात के वड़ोदरा का है, जहां एक परिवार देश में लगे लॉकडाउन और कोरोना महामारी से इस कदर टूट चुका था, उसे कहीं कोई सहारा नहीं मिल रहा था। इस संकट के समय में इस शख्स और इसके परिवार के लिए अंतिम सहारा बना श्मशान घाट। जहां वो कोरोना से जान गंवाने वालों के अंतिम संस्कार की सभी जिम्मेदारियां निभा रहा है। इस कार्य में उसकी पत्नी भी हाथ बंटा रही है। महाराष्ट्र के रहने वाले इस शख्स का नाम कन्हैयालाल शिर्के है। कन्हैयालाल शिर्के पिछले एक साल से वड़ोदरा के वासना गांव के श्मशान घाट में रह रहा है और कोरोना से मरने वालों के अंतिम संस्कार की सभी जिम्मेदारियों को निभा रहा है। कन्हैयालाल महाराष्ट्र से रोजी रोटी कमाने वड़ोदरा आया था। उसकी पत्नी महाराष्ट्र के मुंबई में ही कुछ छोटा मोटा काम करती थी।

कन्हैयालाल यहां आकर पेंटिंग का काम करता था, लेकिन एक साल पहले कन्हैयालाल की कोरोना महामारी के बीच हुए लॉकडाउन में नौकरी चली गई। कुछ दिन ऐसे ही बिताने के बाद उसने मेहनत मजदूरी की, लेकिन उससे गुजारा कर पाना बेहद मुश्किल हो गया। इस बीच उसकी पत्नी और बच्चे भी वड़ोदरा आ गए। अब उस पर जिम्मेदारियां और भी बढ़ गईं। उसके पास न हीं कोई नौकरी थी और न हीं रहने का ठिकाना।

इसके बाद कन्हैयालाल शिर्के ने वड़ोदरा के वासना गांव के श्मशान घाट को ही अपना आशियाना बना लिया। यहां रहते हुए कन्हैयालाल ने शवों के अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी निभानी शुरू कर दी। इस काम में कन्हैयालाल की पत्नी ने भी उसका साथ देना शुरू कर दिया है। सुबह से पति पत्नी दोनों श्मशान घाट के काम में लग जाते हैं और बच्चे भी कई बार उनका हाथ बंटाते हैं।

कन्हैयालाल ने बताया कि शुरुआत  में दिक्कतें आईं और काफी परेशानी उठानी पड़ी। लेकिन जब कुछ नहीं मिला तब यह अंतिम धाम ही मिल गया। कन्हैयालाल की पत्नी अनिता ने बताया कि उनके लिए पति ही सब कुछ है, उनका सहारा काफी है। पति जहां भी रखेंगे वह खुशी खुशी रह लेंगी। पति पत्नी दोनों अभी खुश हैं और बच्चों की भी परवरिश कर रहे हैं। जहां सभी को अंतिम मोक्ष मिलता है. वहीं उनको अंतिम सहारा मिल गया है।

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