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बीस फुट का जहरीला सियासी सांप और बीस-बीस बच्चों का मजहबी बाप

By: RNI Hindi Desk 
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बीस फुट का जहरीला सियासी सांप और बीस-बीस बच्चों का मजहबी बाप

{ प्रभात रंजन दीन की फेसबुक वाल से }

आखिरकार देश के प्रधानमंत्री को आगे आना पड़ा… कोरोना ने भारत के लोगों की असलियत उजागर कर दी है। प्रधानमंत्री को कहना ही पड़ा कि घर में रहो, भीड़ से बचो और भीड़ न बनो… कोरोना का संक्रमण पता चलने के बाद संक्रमित व्यक्ति इलाज कराने के बजाय भाग जाए और भीड़ में खो जाए, दूसरे को संक्रमित करने लगे… तो क्या होगा..! 

महामारी इस कदर फैलेगी कि मौत की लहर पूरे देश को लपेट लेगी। अंतिम संस्कार के भी लाले पड़ जाएंगे। यह है भारतीयों की असलियत। मानवीयता के तहत ईरान और मध्य पूर्व के देशों से और चीन से लोगों को उठा कर भारत लाया जा रहा है, लेकिन यहां पहुंचते ही वे भारत की भीड़ में छुप जा रहे हैं।

भारत की भीड़ बस इसी निमित्त रह गई है। बीमारी लेकर भीड़ में घुस जाओ। अपराध करके भीड़ में छुप जाओ। भ्रष्टाचार करके भीड़ में छुप जाओ। यहां इतनी भीड़ जम चुकी है कि कोरोना ने थोड़ा भी बड़ा आकार लिया, तो समझें महाकाल हो जाएगा।

इतनी भारी भीड़ का इलाज तो आप सोचिए भी मत। आज ही एक छोटी सी खबर अखबार के कोने में दिखी। संसद में किसी सांसद ने जनसंख्या नीति लाने और दो बच्चे पैदा करने का नियम लागू करने की मांग की। यह खबर सिंगल कॉलम की खबर बनी, कई अखबारों में तो यह खबर ही नहीं थी।

प्रभात रंजन दीन

यह भारतीय मीडिया की प्राथमिकता है और भारतीय मीडिया की जागरूकता का स्तर है। जनसंख्या-नीति के नाम पर ही कट्टर इस्लामी धर्मनिरपेक्ष और नस्लदूषित प्रगतिशील बौखला उठते हैं। चीन ने जनसंख्या विस्फोट को काबू में कर लिया।

आपने देखा न किस तरह उसने कोरोना को भी नियंत्रित कर लिया। उसी ने पूरी दुनिया में कोरोना फैलाया, पर अपना घर दुरुस्त कर लिया। हम तो कोरोना से संक्रमित होकर भाग निकलने वाली भारतीय लोकतंत्र की भीड़ हैं…  

भारत की भीड़ यही रटती रहती है… जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी… भारत का विनाश करने वाले राजनीतिकों और भारत को खंडित करने पर आमादा मजहबियों का यह प्रिय नारा हो चुका है। इस बेहूदे और खतरनाक नारे को नष्ट करना होगा।

तभी जनसंख्या के आतंकवाद से भारतवर्ष को मुक्ति मिल सकेगी। बच्चे पैदा करने की जैविक प्रक्रिया को धर्म-विस्तार का जरिया बताने वाली मक्कार मस्तिष्क-धारा को जल्दी नष्ट नहीं किया गया तो अनर्थ हो जाएगा। देश की जमीन कीड़े-मकोड़ों से ढंक जाएगी और मनुष्यता समाप्त हो जाएगी।

भारतवर्ष के नेता तो मक्कारी के गोल्ड-मेडलिस्ट हैं। उन्होंने राजनीति और धर्म को इस कदर बुन दिया है कि देश का आम आदमी उसमें उलझ कर रह गया है। एक तरफ नेता हमें भीड़ में तब्दील करने का षड्यंत्र करता है तो दूसरी तरफ नेताओं की अनाथशालाओं में पलने वाले पापी-धर्मगुरु धर्म के विस्तार के नाम पर हमें चक्रवृद्धि-ब्याज (कम्पाउंड इंट्रेस्ट) की गति से बच्चे पैदा करने वाला गलीज जानवर बनाने पर आमादा हैं।

आजादी के बाद भारत एक कच्चे माल की तरह महात्मा गांधी और जवाहर लाल नेहरू जैसे जिम्मेदार अभिभावक के हाथ में मिला, उन्होंने इसे कुरूप सांचे में ढाल दिया।

मुगलों और अंग्रेजों की गुलामी से सदियों प्रताड़ित और प्रदूषित रही नस्लें अचानक भारतीय नागरिक के रूप में तब्दील हो गई थीं, उन्हें सभ्य-सुसंस्कृत-सुशिक्षित करने का गांधी-नेहरू ने कोई विचार ही नहीं किया। धर्म के नाम पर देश बांटने वालों को भारत में रहने की इजाजत देकर भारत के भविष्य पर कोई विचार ही नहीं किया। क्या वे हमारे गैर-जिम्मेदार गार्डियन थे..? 

जिन्होंने अपना दायित्व नहीं निभाया..?  नहीं… ऐसा नहीं है। वे गैर-जिम्मेदार नहीं थे। वे बेहद चालाक थे। उन्होंने केवल देश ही नहीं बांटा, बल्कि भावनाओं और रिश्ते को भी उपाधि बना कर अपने सिर पर धारण कर लिया। कोई पिता बना गया तो कोई चाचा।

उन्होंने अपनी तरह के नेताओं की फसलें पैदा कीं और गुलाम प्रजा से आजाद नागरिक बने लोगों को भीड़ में तब्दील कर नव-गुलाम (नीयो-स्लेव) बना कर रखने की सोची-समझी साजिश रची। उनके लिए यह भीड़ एक-एक वोट थी। इसीलिए लोगों में लोकतंत्र की समझ विकसित नहीं होने दी। उसे रोका।

लोगों को मताधिकार के सारगर्भित अर्थ और दायित्व की समझदारी से अलग किया। जन-प्रतिनिधि के चयन की नैतिक समझ का विकास होने से रोका। भीड़ को और भीड़ पैदा करने की तरफ उन्मुख किया। भीड़ नेता को सत्ता देती गई, लूटने का मौका देती गई और देश का धन लूट कर विदेशों में जमा करने का अवसर देती गई।

नेताओं की नस्लों ने जो मुगलों से और अंग्रेजों से विरासत में लिया था उसे भारतीय भीड़ पर आजमाया। भीड़ सहती रही और बच्चे पैदा करती रही। कुछ सीखती तब तो बोलती..! तब तो मुट्ठियां तानती..! तब तो प्रतिकार करती..!

भीड़ को तो केवल रटना सिखाया गया, सीखना नहीं। उसे रटाया गया ‘जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी… भीड़ को यह याद दिलाया जाता रहा कि उसकी संख्या भारी होगी तो सत्ता में उसकी भागीदारी होगी।

तादाद के नाम पर देश तब भी बंटा था और अब भी बंटने की तरफ बढ़ रहा है। समाज तो पूरी तरह बंट ही चुका है। इसे और बदनुमा और बदरंग करने में लगे नेताओं की सूची में अनगिनत नाम हैं… पूरी श्रृंखला है… नेहरू और गांधियों से होते हुए राजाओं, लल्लुओं, स्व-घोषित नेताजीओं, मायावतियों, पवारों जैसे अनगिनत नाम हैं उसमें, जो भीड़तंत्र के प्रतिफल में लोकतंत्र के महाराजे-महारानियां बनते हैं और विचित्र देश की विद्रूप भीड़ अपनी हिस्सेदारी की रट लगाती रहती है।

इस भीड़ का बड़ा हिस्सा कोरोना से अधिक खतरनाक है। इसे अपनी हिस्सेदारी में फिर एक देश चाहिए, आजादी चाहिए, देश टुकड़े-टुकड़े में विभक्त होना चाहिए। भारत की यह भीड़ इसी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए शाहीनबाग, घंटाघर और पार्क सर्कस का एक्सपेरिमेंट्स करती है।

इस भीड़ को यह बताया जा रहा है कि उसे अभी और संख्या भारी करनी है। भारतीयों की इस भीड़ में बांग्लादेशियों की भीड़, पाकिस्तानियों की भीड़, रोहिंग्याओं की भीड़ विलीन हो गई है।

इसीलिए इस भीड़ को सीएए पसंद नहीं है। इसी भीड़ को एनआरसी पसंद नहीं है। इस भीड़ को कोरोना भी एके-47 जैसा हथियार दिखाई देता है, जिसका इस्तेमाल जेहाद के लिए किया जा सकता है। आप समझ रहे हैं न..? मिड्ल-ईस्ट से बचा कर लाए गए कई लोगों ने कहा भी कि कोरोना का टेस्ट इस्लाम में मना है।

भारत में आबादी इस तेजी से बढ़ रही है कि हर साल हम जनसंख्या के हिसाब से आस्ट्रेलिया जैसे एक देश का निर्माण कर लेते हैं। भीड़ बढ़ाने में हमें यह महारत हासिल है कि हम दस साल में एक ब्राजील बना लेते हैं। अपने उत्तर प्रदेश की ही आबादी अकेले ब्राजील से अधिक है। बिहार की जनसंख्या जर्मनी से अधिक है।

बंगाल वियतनाम से ऊपर चल रहा है। भारत के दूसरे राज्य भी किसी न किसी देश से ही प्रतियोगिता में उतरे हुए हैं, शिक्षा और विकास में नहीं, केवल बच्चे पैदा करने में। जिस देश के लोकतंत्र को ‘संख्या भारी और हिस्सेदारी’ के फर्जी नारे से ताकत देने का धोखा रचा जाता हो, उस देश हम रहेंगे कहां और खाएंगे क्या..? इसकी किसी को चिंता नहीं। भीड़ के दबाव में पर्यावरण नष्ट हो रहा है। प्राकृतिक संसाधनों की लूट मची है। भीड़ अब जंगलों में घुसती जा रही है।

इतना भी नहीं सोचती कि वहां कोई और प्राणी रहते हैं। रहने के लिए जमीन नहीं तो अनाज कहां पैदा करेंगे..? फिर भी हम ‘संख्या भारी कर लोकतंत्र को शक्ति प्रदान कर रहे हैं। कैसे लोग हैं हम..? हमारा देश अब उस मेले के तंबू जैसा नहीं रहा जहां बीस फुट का सियासी-सांप और बीस बच्चों का बाप दिखा कर पैसा वसूला जाता था।

आज उस मेले के फर्जी जादूघर की बात नहीं रही… अब यह कठोर सत्य है। बीस-बीस बच्चों का बाप सड़कों, गलियों, चौराहों पर बिखरा दिखता है जो लोकतंत्र का नारा उठाए कीड़े-मकोड़े जैसी संततियों के साथ सारे संसाधन खा रहा है। सियासी और मजहबी सांप हमें संख्या-भारी करने का जहर निरंतर पिला रहा है और कोरोना के जरिए हमें मौत के घाट उतार रहा है…

अगर अब भी एक या दो बच्चे पैदा करने का सख्त कानून नहीं बना तो देश जल्दी ही विनाशकारी परिस्थियों में खड़ा मिलेगा। लिहाजा, सत्ता पर भारी दबाव बनाना जरूरी है… यह भारतवर्ष और भारतवर्ष की आने वाली पीढ़ियों का भला सोचने वाले सच्चे देश प्रेमियों के इम्तिहान की घड़ी है… आईये आगे बढ़ें…

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