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तालिबानी नेता अब्दुल गनी बरादर संभालेंगे अफगानिस्तान का कमान!, अमेरिका से है खास रिश्ता?

अमेरिकी सैनिकों के हटने के 10 दिन बाद ही तालिबानी लड़ाकों ने अफगानिस्तान पर अपना कब्जा जमा लिया। वहीं कभी तालिबान के शुभचिंतक रहे राष्ट्रपति समेत कई नेता देश को छोड़कर चले गए। और आवाम को हिंसा की आग में झोंक दिया। किसी ने कल्पना भी नहीं की थी जो तालिबान अमेरिकी सैनिकों के निगरानी में 20 सालों तक सुरक्षित था, वो इन सैनिकों के हटने के 10 दिन बाद ही असुरक्षित हो जायेगा।

By Amit ranjan 
Updated Date

नई दिल्ली : अमेरिकी सैनिकों के हटने के 10 दिन बाद ही तालिबानी लड़ाकों ने अफगानिस्तान पर अपना कब्जा जमा लिया। वहीं कभी तालिबान के शुभचिंतक रहे राष्ट्रपति समेत कई नेता देश को छोड़कर चले गए। और आवाम को हिंसा की आग में झोंक दिया। किसी ने कल्पना भी नहीं की थी जो तालिबान अमेरिकी सैनिकों के निगरानी में 20 सालों तक सुरक्षित था, वो इन सैनिकों के हटने के 10 दिन बाद ही असुरक्षित हो जायेगा।

तालिबान के दुबारा अफगानिस्तान पर कब्जे के बाद ऐसे कई कयास लगाये जा रहे है, जो अमेरिकी प्रशासन पर सवालियां निशान खड़ा कर रहा है। यानी की जिस तालिबानी कमांडर अब्दुल गनी बिरादरी को रिहा करन के लिए अमेरिकी ने पाकिस्तान से पैरवी की थी। अब वही गनी बिरादरी अफगानिस्तान का नया मुखिया होगा।

आपको बता दें कि बरादर अफगानिस्तान में 20 साल से जारी युद्ध के विजेता के तौर पर उभरा है। वो फिलहाल तालिबानी राजनीति का चीफ और संगठन का सबसे बड़ा पब्लिक चेहरा है। ऐसे में चिंता की बात उसका हालिया बयान है जिसमें उसने कहा कि तालिबान की असली परीक्षा अभी शुरू हुई है और उसे मुल्क की खिदमत करनी है।

कौन है अब्दुल गनी बरादर?                  

1968 में उरुजगान में जन्मे बरादर ने साल 1980 के दशक में सोवियत संघ के खिलाफ अफगान मुजाहिदीन में लड़ाई लड़ी थी। साल 1992 में रूसियों को बाहर निकालने के बाद और देश में प्रतिद्वंदी गुटों के युद्ध के बीच बरादर ने अपने पूर्व कमांडर और बहनोई, मोहम्मद उमर के साथ कंधार में एक मदरसा स्थापित किया। उसे फरवरी, 2010 में गिरफ्तार किया गया। दोनों ने मिलकर तालिबान की स्थापना की, जो देश के धार्मिक शुद्धिकरण और एक अमीरात के निर्माण के लिए समर्पित युवा इस्लामी विद्वानों के नेतृत्व में हुआ एक आंदोलन था।

उसे फरवरी, 2010 में गिरफ्तार किया गया। बरादर को पाकिस्तानी शहर कराची से अमेरिका -पाकिस्तान के संयुक्त अभियान में पकड़ा गया। साल 2012 के अंत तक मुल्ला बरादर के बारे में बहुत कम चर्चा होती थी। हालांकि उसका नाम तालिबान कैदियों की सूची में सबसे ऊपर था, जिन्हें शांति वार्ता को प्रोत्साहित करने के लिए अफगान रिहा करना चाहते थे।

द गार्जियन की एक रिपोर्ट में बरादर को जीत का प्रमुख रणनीतिकार बताया गया है। बरादर ने पांच साल के तालिबानी शासन में सैन्य और प्रशासनिक भूमिकाएं निभाईं थीं। तब उसके पास उप रक्षा मंत्री का प्रभार भी था। तालिबान के 20 साल के निर्वासन के दौरान, बरादर ने शक्तिशाली सैन्य नेता और माइक्रो पॉलिटिकल कंट्रोलर होने का रुतबा हासिल किया।

2018 में संभाली बातचीत की कमान

रिपोर्ट में कहा गया है कि 2018 में अमेरिकी रवैया बदला तो पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के खास और अफगान दूत, जालमय खलीलजाद ने पाकिस्तानियों से बरादर को रिहा करने के लिए कहा, ताकि वो कतर में चल रही बातचीत की अगुवाई कर सके। दरअसल अमेरिका को इस बात का भरोसा था कि बरादर सत्ता के साझाकरण या हस्तांतरण दोनों स्थितियों में अहम भूमिका निभाएगा।

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