जनजातीय कला में झलकी परंपरा और प्रकृति का सम्मान, घोड़ाडोंगरी बना सांस्कृतिक चेतना का केंद्र।
जनजातीय कला में झलकी परंपरा और प्रकृति का सम्मान, घोड़ाडोंगरी बना सांस्कृतिक चेतना का केंद्र।
पांच दिनों तक भक्त नंगे पैर तपती धूप में पूरे नगर का भ्रमण करते हैं। कुछ श्रद्धालु तो अपने शरीर में नाड़े पिरोकर अपनी आस्था और संकल्प का प्रदर्शन करते हैं, जो इस परंपरा को और भी अद्वितीय बनाता है।