सुप्रीम कोर्ट ने संपत्तियों के विध्वंस के मुद्दे पर सख्त रुख अपनाते हुए अधिकारियों को निर्देश दिया कि बिना नोटिस के किसी भी संपत्ति को नहीं तोड़ा जा सकता। न्यायमूर्ति बी.आर. गवाई और केवी विश्वनाथन की अध्यक्षता वाली पीठ ने फैसला सुनाते हुए कहा कि कार्यपालिका न्यायपालिका का स्थान नहीं ले सकती और किसी व्यक्ति की संपत्ति को सिर्फ आरोपों के आधार पर ध्वस्त करना संविधान का उल्लंघन है।
1.नोटिस देने की अनिवार्यता: सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि किसी भी संपत्ति को विध्वंस करने से पहले उसके मालिक को 15 दिन पहले कारण बताओ नोटिस दिया जाएगा। यह नोटिस पंजीकृत डाक के माध्यम से भेजा जाएगा और इसके बारे में सूचना संपत्ति की बाहरी दीवार पर चिपकाई जाएगी।
2.मूलभूत अधिकारों का संरक्षण: कोर्ट ने कहा कि घर का अधिकार एक मौलिक अधिकार है, और इसे बिना उचित कारण के छीनना पूरी तरह असंवैधानिक है। कार्यपालिका को यह अधिकार नहीं है कि वह किसी व्यक्ति को दोषी ठहराए और उसकी संपत्ति को तोड़े।
3.अधिकारियों की जवाबदेही: कोर्ट ने यह भी कहा कि जो सरकारी अधिकारी बिना कानूनी आधार के संपत्ति का विध्वंस करते हैं, उन्हें जवाबदेह ठहराया जाएगा। इस तरह की कार्रवाइयों के लिए अधिकारियों को दंडित किया जाएगा।
4.विध्वंस की वीडियोग्राफी: सुप्रीम कोर्ट ने यह निर्देश दिया कि किसी भी विध्वंस कार्रवाई की वीडियोग्राफी की जाएगी, और किसी भी दिशा-निर्देश के उल्लंघन पर कोर्ट की अवमानना मानी जाएगी।
5.सार्वजनिक सुरक्षा और निष्पक्षता: कोर्ट ने सार्वजनिक सुरक्षा की अहमियत को स्वीकार किया, लेकिन साथ ही यह भी सुनिश्चित किया कि विध्वंस का निर्णय किसी भी व्यक्ति के खिलाफ बिना उचित कानूनी प्रक्रिया के नहीं लिया जाए।
6.संयुक्त राष्ट्र की आपत्ति: इस आदेश से पहले संयुक्त राष्ट्र ने बुलडोजर कार्रवाई को मानवाधिकारों का उल्लंघन बताते हुए आपत्ति जताई थी, खासकर जब यह कार्रवाई अल्पसंख्यक समुदायों के खिलाफ की जाती है।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश का असर: सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करेगा और अधिकारियों को मनमानी कार्रवाई से रोकने में मदद करेगा। इस फैसले से यह सुनिश्चित किया जाएगा कि कोई भी व्यक्ति बिना किसी कानूनी प्रक्रिया के अपने घर से वंचित नहीं होगा और न्यायपालिका के आदेशों का पालन किया जाएगा।