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भोजन, प्रेम, बुद्धिमत्ता और दान के विषय में हर मनुष्य को ये चीजें जानना है बेहद जरूरी, जानें क्या बताया है आचार्य चाणक्य ने

By RNI Hindi Desk 
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रिपोर्ट: सत्यम दुबे

नई दिल्ली: आचार्य चाणक्य का नाम आते ही लोगो में विद्वता आनी शुरु हो जाती है। आचार्य चाणक्य ने अपनी नीति और विद्वाता से चंद्रगुप्त मौर्य को राजगद्दी पर बैठा दिया था। इस विद्वान ने राजनीति,अर्थनीति,कृषि,समाजनीति आदि ग्रंथो की रचना की थी। जिसके बाद दुनिया ने इन विषयों को पहली बार देखा है। आज हम आचार्य चाणक्य के नीतिशास्त्र के उस नीति की बात करेंगे, जिसमें उन्होने बताया है कि खुद की भोजन, प्रेम, बुद्धिमत्ता और दान के विषय में…

आचार्य चाणक्य ने अपने नीति शास्त्र में भोजन के बारे में बताया है कि एक सच्चा भोजन वह है जो ब्राह्मण को देने के पश्चात शेष है। सनातन धर्म में ब्राह्मण को बहुत ही पूजनीय माना गया है इसलिए यहां पर कहने का तात्पर्य यह है कि जो व्यक्ति स्वयं की भूख शांत करने से पहले ब्राह्मण को भोजन कराता है और बाद में शेष स्वयं भोजन करता है, वह भोजन अमृत समान है। इसी तरह केवल ब्राह्मण नहीं बल्कि किसी जरुरतमंद को स्वयं से पहले भोजन करवाने के पश्चात जो भोजन बचता है वह प्रसाद के समान होता है क्योंकि जो व्यक्ति स्वयं की भूख के बजाए दूसरों की क्षुदा के बारे में सोचता है ईश्वर भी उससे प्रसन्न होते हैं।

उन्हेने अपने नीति शास्त्र में प्रेम के बारे में बताया है कि प्रेम व्यक्ति हर व्यक्ति एक दूसरे से करता है, बस उसका रिश्तों के अनुसार स्वरुप बदल जाता है। प्रेम ही व्यक्ति को एक दूसरे से बांधकर रखता है। आचार्य चाणक्य कहते हैं कि प्रेम वह सत्य है जो दुसरो को दिया जाता है। स्वंय से जो प्रेम होता है, वह प्रेम नहीं कहलाता है।  कहने का तात्पर्य यह है कि प्रेम में निस्वार्थ भावना का होना आवश्यक होता है। जो व्यक्ति निस्वार्थ भाव से किसी से प्रेम करता है वही सच्चे मायने में प्रेम है। केवल स्वंय से प्रेम करना स्वार्थ होता है।

इसके बाद उन्होन ज्ञान के बारे में बताया है कि चाहे व्यक्ति कितना भी ज्ञान अर्जित कर लें,चाहे वह कितने वेद-पुराण, विज्ञान की जानकारी रखता हो परंतु जो सही रहा पर नहीं चलता उसे बुद्धिमान नहीं कहा जा सकता है। बुद्धिमत्ता सही मायने मे वह होती है जो मनुष्य को पापकर्म करने से रोकती है।

आचार्य चाणक्य ने दान के बारे में बताया है कि केवल धन, अन्न का नहीं होता है बल्कि दान वह होता है जो बिलकुल निस्वार्थ भाव से किया जाए चाहें वह केवल श्रम सेवा या किसी की मदद करना ही क्यों न हो। आचार्य चाणक्य कहते हैं कि सही मायने में श्रेष्ठ दान वह है जो बिना दिखावे के किया जाता है। व्यक्ति को सदैव गुप्त दान ही करना चाहिए।

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