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करो योग रहो निरोग- फेफड़ों की कर्यक्षमता बढ़ाना है तो करें यह योग

By: RNI Hindi Desk 
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करो योग रहो निरोग- फेफड़ों की कर्यक्षमता बढ़ाना है तो करें यह योग

योग शरीर और मन को साधने की एक प्रक्रिया है। वेदों के छह अंगों में से एक है योग। मूलत: योग का वर्णन सर्वप्रथम वेदों में ही हुआ है लेकिन यह विद्या वेद के लिखे जाने से 15000 ईसा पूर्व के पहले से ही प्रचलन में थी, क्योंकि वेदों की वाचिक परंपरा हजारों वर्ष से चली आ रही थी। अत: वेद विद्या उतनी ही प्राचनी है जितना प्राचीन ज्योतिष या सिंधु सरस्वती सभ्यता है। वहीं योग महत्व तब समझ में आता है जब आप इस अपने जिवन में शामिल कर लेते हैं। आज हम आपको बताएंगे की आप अपने फेफड़े को कैसे साफ रखे।

पूर्ण भुजा शक्ति विकासक क्रिया योग का लाभ

इस योग को नियमित रूप से करने से जहां एर ओर प्राणशक्ति का विकास होता है तो वहीं खुलकर गहरी सांस लेने और छोड़ने से फेफड़ों की कार्यक्षमता बढ़ती है। इसके चलते प्राणशक्ति का स्तर बढ़ जाता है और व्यक्ति दिनभर चुस्त-दुरुस्त बना रहता है। इसके नियमित अभ्यास से भुजाओं की मांसपेशियां मजबूत होती हैं और कंधों की जकड़न दूर होती है। साथ ही साथ सहीर के सभी अंगों में प्राणशक्ति का संचार होने लगता है।

पूर्ण भुजा शक्ति विकासक क्रिया योग का लाभ

पूर्ण भुजा शक्ति विकासक क्रिया योग करने के लिए सबसे पहले सावघान मुद्रा में खड़े हो जाएं। उसके बाद दोनों पैरों के पंजों को आपस में मिला लें। फिर भुजाओं को सीधा, कंधों के पीछ खींचकर और सीने को तानकर रखें।

इसके बाद दाएं हाथ का अंगूठा भीतर और अंगुलियां बाहर रखते हुए मुट्ठी बांध लें। फिर बाएं हाथ के तलवे को जंघा से सटाकर रखें। श्वास भरते हुए दाईं भुजा को कंधों के सामने लाएं। इसके बाद श्वास भरते हुए भुजा को सिर के ऊपर लाएं। अब श्वास छोड़ें और दांईं हथेली को कंधों के पीछे से नीचे लेकर आएं। इस तरह एक चक्र पूरा होगा। अब दाएं हाथ से लगातार 10 बार इसी तरह गोलाकार चलाएं। उसके बाद बाएं हाथ से भी मुट्ठी बनाकर 10 बार गोलाकार चलाएं।

अंत में धीर-धीरे श्वास को सामान्या कर लें। श्वास के सामान्य होने के बाद दोनों हाथों की मुट्ठी बनाकर 10 बार गोलाकर चलाएं। सामने से पीछे की ओर ले जाएं। इस दौरान श्वास की एकाग्रता और संतुलन बनाए रखें। जिस तरह हाथों को एक दिशा में गोलाकार घुमाते हैं, उसी तरह हाथों को उल्टी दिशा में भी गोलाकार घुमाना चाहिए। इससे विपरीत योग संचान भी हो जाता है, जो कि जरूरी है।

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