मध्यप्रदेश कांग्रेस कमेटी के मीडिया विभाग के अध्यक्ष मुकेश नायक ने भाजपा सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि प्रदेश में भ्रष्टाचार अब केवल आरोप नहीं रहा, बल्कि स्वयं सरकार और प्रशासन की स्वीकारोक्ति बन चुका है। उन्होंने कहा कि राज्य के मुख्य सचिव द्वारा कलेक्टरों के साथ वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग में दिया गया कथित बयान-“प्रशासनिक काम बिना पैसे के नहीं होते”-भ्रष्टाचार के संस्थागत स्वरूप का सबसे बड़ा प्रमाण है।
मुकेश नायक ने कहा कि यह बयान किसी विपक्षी नेता का नहीं, बल्कि प्रदेश के सर्वोच्च प्रशासनिक अधिकारी का है, जिसे हल्के में नहीं लिया जा सकता। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि कलेक्टर स्तर पर बिना पैसे के काम नहीं होता, तो आम जनता को न्याय कैसे मिलेगा? उन्होंने पूछा कि मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव अब तक क्या कर रहे थे और क्या भाजपा सरकार में भ्रष्टाचार एक स्वीकृत प्रशासनिक व्यवस्था बन चुका है?
मुकेश नायक ने आरोप लगाया कि बीते दो वर्षों में प्रदेश के कई जिलों से कलेक्टरों पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप सामने आए हैं। उन्होंने कहा कि अशोकनगर में कलेक्टर के स्थानांतरण को लेकर तीन करोड़ रुपये की रिश्वत के आरोप लगे, लेकिन सरकार ने अब तक कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया। भिंड जिले में कलेक्टर और भाजपा विधायक के बीच सार्वजनिक विवाद ने भी प्रशासनिक निर्णयों और अवैध वसूली को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए। आरोप लगाया कि जमीन, रेत, शराब, माइनिंग और ट्रांसफर-पोस्टिंग जैसे मामलों में कलेक्टर स्तर तक भ्रष्टाचार के आरोपों के बावजूद प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई।
कांग्रेस मीडिया अध्यक्ष ने कहा कि भाजपा सरकार का मॉडल अब पूरी तरह स्पष्ट हो चुका है-
जनता पर बढ़ता कर्ज
योजनाओं में कमीशनखोरी
ट्रांसफर-पोस्टिंग का खुला बाजार
प्रशासनिक संरक्षण में भ्रष्टाचार
उन्होंने कहा कि मुख्य सचिव का बयान यह दर्शाता है कि यह सरकार भ्रष्टाचार रोकने में नाकाम नहीं, बल्कि उसे सामान्य मान चुकी है।
मुकेश नायक ने सरकार से मांग की कि-
मुख्य सचिव के बयान को गंभीरता से लेते हुए प्रदेश के सभी जिलों की प्रशासनिक कार्यप्रणाली की जांच कराई जाए।
बीते दो वर्षों में कलेक्टरों पर लगे सभी आरोपों की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच हो।
मुख्यमंत्री यह स्पष्ट करें कि वे इस बयान से सहमत हैं या नहीं।
यदि बयान गलत है, तो मुख्य सचिव पर अब तक कार्रवाई क्यों नहीं की गई?
मुकेश नायक ने कहा कि भाजपा सरकार में सुशासन केवल एक नारा बनकर रह गया है, जबकि भ्रष्टाचार इसकी असली पहचान बन चुका है। उन्होंने कहा कि आज़ादी के बाद महात्मा गांधी और देश के नेताओं का लक्ष्य था कि प्रशासनिक सेवाओं को जनोन्मुखी और समयबद्ध न्याय देने वाला बनाया जाए, लेकिन केंद्रीकरण और एकाधिकार के कारण भ्रष्टाचार बढ़ता गया। उन्होंने जोर देकर कहा कि अब समय आ गया है कि भारतीय प्रशासनिक सेवा और राज्य प्रशासनिक सेवाओं में व्यापक सुधार कर उन्हें जनता के प्रति जवाबदेह बनाया जाए।