एम्स गोरखपुर ने चिकित्सा सेवाओं को आधुनिक और तीव्र बनाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। संस्थान में ‘AI in Healthcare’ विषय पर दो दिवसीय विशेष कार्यशाला का आयोजन किया गया है, जिसमें आईआईटी बॉम्बे के विशेषज्ञ डॉक्टर, फैकल्टी और मेडिकल छात्रों को स्वास्थ्य क्षेत्र में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के उपयोग का प्रशिक्षण दे रहे हैं। आने वाले कुछ महीनों से एक साल के भीतर एम्स अपनी नियमित चिकित्सा प्रक्रियाओं में एआई को शामिल करने जा रहा है।
कार्यशाला के मुख्य बिंदु: डेटा से रेडियोलॉजी तक एआई का सफर
- विशेषज्ञ मार्गदर्शन: आईआईटी बॉम्बे के हेल्थकेयर एआई विशेषज्ञों द्वारा मेडिकल डेटा विश्लेषण और क्लीनिकल वर्कफ़्लो पर मंथन।
- रेडियोलॉजी और एक्स-रे: एक्स-रे व इमेजिंग में असामान्य पैटर्न या संभावित गड़बड़ी की त्वरित पहचान कर डॉक्टरों का ध्यान आकर्षित करना।
- समय की बचत: विशाल मेडिकल डेटा को मैन्युअली खंगालने के बजाय एआई के जरिए कुछ ही पलों में ट्रेंड्स और आंकड़ों का विश्लेषण।
एआई: विकल्प नहीं, बल्कि ‘तकनीकी सहयोगी’ (Technical Copilot)
- ह्यूमन टच सर्वोपरि: एम्स गोरखपुर की निदेशक डॉ. विभा दत्ता और विशेषज्ञों के अनुसार, एआई कभी भी डॉक्टर का विकल्प नहीं हो सकता।
- संवेदनाएं और निर्णय: मरीज की भावनाएं समझना, ढांढस बंधाना और संपूर्ण मेडिकल हिस्ट्री, लक्षणों व अन्य जांचों के आधार पर अंतिम निदान व इलाज का फैसला डॉक्टर ही करेंगे।
एम्स गोरखपुर का रोडमैप: कब तक लागू होगा एआई?
- प्रशिक्षण चरण जारी: वर्तमान में फैकल्टी और चिकित्सकों को एआई की कार्यप्रणाली और उसकी सीमाओं (Limitations) से अवगत कराया जा रहा है।
- समयावधि: आगामी 6 महीने से 1 साल के भीतर चिकित्सा प्रक्रियाओं में एआई सपोर्ट सिस्टम को धरातल पर उतारा जाएगा।
चुनौतियां: डेटा प्राइवेसी और कानूनी जवाबदेही
स्वास्थ्य क्षेत्र में एआई के अपार लाभों के साथ कुछ गंभीर चुनौतियां भी जुड़ी हैं:
- डेटा प्राइवेसी: मरीजों के संवेदनशील और निजी स्वास्थ्य आंकड़ों की सुरक्षा और नियमों के दायरे में इस्तेमाल।
- सटीकता और जवाबदेही: एआई के त्रुटिपूर्ण परिणाम (False Positive/Negative) की स्थिति में चिकित्सकीय और कानूनी दायित्व तय करना।
रिपोर्ट – अंकित श्रीवास्तव