देश के उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू का बड़ा बयान सामने आया है। उपराष्ट्रपति ने शनिवार को कहा है कि राष्ट्रवाद का मतलब केवल जय हिंद कहना या ‘जन गण मन’ या ‘वंदे मातरम’ गाना नहीं है। ‘जय हिंद’ का मतलब हर भारतीय की जय हो है, जो तब संभव है जब उनकी जरूरतों का ध्यान रखा जाता है, उन्हें ठीक से खाना मिलता हो, वो कपड़े पहनें और भेदभाव का सामना न करें।
नायडू ने आगे कहा कि ‘राष्ट्र’ का मतलब भौगोलिक सीमा नहीं है, राष्ट्र में सब कुछ है, उनका कल्याण, राष्ट्रवाद है। हमारी एक शानदार सभ्यता है जो एक-दूसरे की देखभाल करने और समस्याओं को साझा करने का प्रतीक है। हमारे पूर्वजों ने हमें सीख दी है कि पूरा ‘विश्व एक परिवार है।’
उन्होंने कहा, “स्वतंत्रता से, नेताजी का मतलब केवल राजनीतिक बंधन से मुक्ति नहीं था, बल्कि धन का समान वितरण, जातिगत बाधाओं का उन्मूलन और सामाजिक असमानताएं और सांप्रदायिकता और धार्मिक असहिष्णुता का विनाश था। आप अपने धर्म से प्रेम करते हैं और उसका पालन करते हैं लेकिन दूसरों से घृणा नहीं कर सकते हैं।”
एक दिन पहले उप राष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने युवाओं से अनुरोध किया कि वे नेताजी सुभाष चंद्र बोस के जीवन से प्रेरणा लें और समाज से गरीबी, अशिक्षा, सामाजिक व लैंगिक भेदभाव और भ्रष्टाचार जैसी बुराइयों को दूर करने के लिए काम करें।
उन्होंने आगे कहा भारत की 65 प्रतिशत आबादी के 35 साल से कम उम्र के होने का जिक्र करते हुए नायडू ने कहा कि युवाओं को नए भारत- एक खुशहाल व समृद्ध भारत जहां सभी के लिए समान अवसर हों और जहां किसी तरह का भेदभाव न हो- के लिए आगे आकर नेतृत्व करना चाहिए।
आप को बता दें कि हैदराबाद में बोस जयंती पर इस कार्यक्रम के अलावा वेंकैया ने सोशल मीडिया पर भी उन्हें याद किया। वेंकैया ने लिखा, ‘एक व्यक्ति किसी विचार के लिए अपनी जान दे सकता है, लेकिन वह विचार उस व्यक्ति कि मृत्यु के बाद हजारों जिंदगियों में जीवित हो उठता है। उनका चमत्कारिक व्यक्तित्व युद्धबंदियों को स्वतंत्रता सेनानियों में तब्दील कर सकता था। दूरदर्शी नेता और आदर्श लीडर नेताजी सुभाष चंद्र बोस को उनकी जयंती पर मेरी श्रद्धांजलि।’
नायडू हैदराबाद में तेलंगाना सरकार के एमसीआर मानव संसाधन विकास संस्थान में बुनियादी (फाउंडेशन) पाठ्यक्रम में शामिल प्रशिक्षु अधिकारियों को बोस की जयंती पर संबोधित कर रहे थे। उस दौरान ये बातें कही है।
साथ ही उन्होंने बोस की जयंती को “पराक्रम दिवस” के तौर पर मनाने के सरकार के फैसले की भी सराहना की। उपराष्ट्रपति ने कहा कि “पराक्रम” या साहस नेताजी के व्यक्तित्व की सबसे अहम खासियत थी।
स्वतंत्रता आंदोलन को लेकर अलग-अलग नेताओं के अलग रुख के बारे में उपराष्ट्रपति ने कहा कि अंतिम लक्ष्य देश को औपनिवेशिक शासन से आजाद कराना था। नेताजी की देश से जाति व्यवस्था को खत्म करने की इच्छा का जिक्र करते हुए नायडू ने कहा कि 1940 के दशक में भी सभी जाति, संप्रदाय और धर्म के सैनिक साथ रहते थे, साझा चूल्हे से खाना खाते थे और भारतीय के तौर पर लड़ते थे।
उन्होंने कहा कि बहुत से लोगों को उनकी महानता के बारे में नहीं पता क्योंकि उनके योगदान का इतिहास की किताबों में समुचित उल्लेख नहीं है। उन्होंने कहा, “हमें अपने कई महान नेताओं की जयंती का जश्न मनाना चाहिए। हमें औपनिवेशिक मानसिकता से बाहर आना होगा।”