आर्थिक तंगी से जूझ रहे निकायों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए उन्हें और अधिकार देने की तैयारी है। निकाय गृहकर, जलकर, सीवर कर के साथ अन्य नए कर लगा सकेंगे। नगर विकास विभाग इसके लिए जरूरत के आधार पर नगर निगम और पालिका परिषद अधिनियम में व्यवस्था करेगा। इसके बाद निकायों को नया कर लगाने के लिए शासन से अनुमति लेने की जरूरत भी नहीं होगी।
आय के नए स्रोत तलाश जाएंगे
निकाय पहले शहरी क्षेत्रों में लगने वाले बाजारों से तहबाजारी की वसूली करते थे। इसके अलावा फूड सप्लीमेंट एक्ट के तहत लाइसेंस बनाने के एवज में शुल्क लेते थे। राज्य सरकार ने तहबाजारी शुल्क समाप्त कर दिया है।
फूड सप्लीमेंट एक्ट निकायों के अधिकार क्षेत्र से बाहर करते हुए फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (एफडीए) के अधीन कर दिया गया है। निकायों के पास आय के अब दूसरे स्रोत नहीं हैं। इसके चलते निकायों को वित्तीय संकट से जूझना पड़ रहा है। राज्य सरकार निकायों को आत्मनिर्भर बनाना चाहती है, इसीलिए उसे शहरी सीमा क्षेत्र में नए कर लगाने का अधिकार देना चाहती है।
निकायों को बनानी होगी उपविधि
नगर निगम और पालिका परिषद अधिनियम में दी गई व्यवस्था के आधार पर निकायों को नए कर की वसूली के लिए उपविधि बनानी होगी। इसे बोर्ड या कार्यकारिणी की बैठक से पास कराना होगा। इसमें ही नए कर लगाने का प्रावधान किया करना होगा। यह भी स्पष्ट करना होगा कि किस कौन-कौन सा नया कर लगाएंगे और उस पर कितना शुल्क लिया जाएगा। इसके दायरे से गरीब और निम्न मध्य वर्ग के लोगों को नहीं लगाया जाएगा, जिससे छोटे लोगों पर अतिरिक्त भार न पड़े।
इन पर हो सकता है विचार
– निजी वाहनों और व्यावसायिक वाहनों पर कर
– निकाय सीमा क्षेत्र में हेलीपैड, हवाई अड्डों, हवाई पट्टियों पर व्यावसायिक कर
– महाराष्ट्र तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल की तरह प्रोफेशनल कर
– गृहकर की तरह खाली जमीनों पर कर
– अचल संपत्तियों के हस्तांतरण पर दो फीसदी कर
पंचम राज्य वित्त आयोग भी कर चुका है संस्तुति
इसके साथ ही निकायों की आय बढ़ाने के लिए पंचम राज्य वित्त आयोग भी कई तरह से नए कर लेने की संस्तुति की है। नगर विकास विभाग इस पर भी जल्द ही प्रस्ताव तैयार कर कैबिनेट मंजूरी के लिए ले सकता है। इन संस्तुतियों के आधार पर भी निकाय नए कर लगाकर अपनी आय बढ़ा सकते हैं।
नए कर होता है विरोध
अमूमन निकायों द्वारा नए कर लगाने का विरोध स्थानीय स्तर पर ही शुरू हो जाता है। निकायों को नया कर लगाने से पहले बोर्ड या कार्यकारिणी से पास कराना होता है। इसमें निर्वाचित प्रतिनिधि सभासद और पार्षद होते हैं और वही इसका विरोध करने लगते हैं।