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कोरोना काल का संकट: शादियों के छपे कार्ड हुए कबाड़, 10 करोड़ रुपये फंसे

By: RNI Hindi Desk 
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कोरोना काल का संकट: शादियों के छपे कार्ड हुए कबाड़, 10 करोड़ रुपये फंसे

शादी की तारीख तय होते ही वर-वधु पक्ष का ध्यान कार्ड की तरफ जाता है। दोनों पक्ष कार्ड छपवाने के लिए दौड़ते हैं। लेकिन कोरोना काल में पूरा सेक्टर कोमा में है। छपे कार्ड न सिर्फ कबाड़ हो रहे हैं, बल्कि आउटडेटेड भी हो गए हैं। कारोबारियों के पास 10 करोड़ से अधिक के कार्ड फंसे हैं।

व्हाट्सएप और ई-कार्ड के दौर में पहले से संकट से जूझ रहे कारोबारियों की दुश्वारियों को कोरोना ने बढ़ा बढ़ा दिया है। शहर और कस्बा मिलाकर 200 से अधिक कारोबारी कार्ड के धंधे में हैं। शादियों के सीजन में एक कारोबारी 10 से 30 लाख रुपये के कार्ड दिल्ली से मंगा लेते हैं। जाड़े की तुलना में गर्मी के मौसम में शादियां बड़े पैमाने पर होती है। ऐसे में कार्ड कारोबारियों को बड़ी संख्या में ऑर्डर मिलते हैं। पिछले 17 साल से कार्ड के धंधे में लगे अभिषेक श्रीवास्तव बताते हैं कि दो लाख रुपये के ऑर्डर के ऐसे कार्ड छप कर गोदाम में रखे हैं। अब शादियां रद्द हो गई हैं या टाल दी गई हैं। दो लाख कीमत के कार्ड में सिर्फ 15 हजार रुपये बतौर एडवांस मिले हैं।

50 लाख कीमत के छपे कार्ड बेकार 
करीब 50 लाख कीमत के छपे कार्ड रद्दी में पड़े हैं। कारोबारी सेराज कहते हैं कि आम तौर पर 20 हजार के ऑर्डर में एडवांस के रूप में 2000 रुपये ही मिलते हैं। अब पूरी रकम लेकर कार्ड छापने की मजबूरी हैं। कार्ड कारोबारी जगदम्बा कहते हैं कि कोई भी कार्ड कारोबारी ऐसा नहीं है कि जिसके पास 50 हजार से एक लाख कीमत के छपे कार्ड न हो। 50 रुपये प्रति पीस वाले कार्ड को कबाड़ी को बेचने की मजबूरी है।

धंधा बदलने की मजबूरी 
कार्ड से जुड़े तमाम ऐसे कारोबारी हैं, जिन्होंने या तो धंधा बदल लिया है या फिर इसी के साथ दूसरा काम भी करने लगे हैं। नखास पर कार्ड की सबसे बड़ी दुकान संचालित करने वाले अभिषेक ने कार्ड के साथ ही बेकरी का धंधा भी शुरू कर दिया है। इसी तरह बक्शीपुर के पप्पू भाई ने कार्ड की दुकान में जनरल मर्चेंट के समान को रख लिया है। इसी तरह शक्ति कुमार, अनिल कुमार आदि ने कार्ड के साथ ही झोले का कारोबार शुरू कर दिया है।

साल भर में 3000 से अधिक आर्डर
शादियों के साथ ही लोग गृहप्रवेश, मुंडन, बर्थ-डे, जनेऊ, शादी के सालगिरह जैसे कार्यक्रमों के कार्ड छपवाते हैं। कार्ड कारोबारी अनिल कुमार बताते हैं कि एक साल में विभिन्न आयोजनों से जुड़े 3000 से अधिक ऑर्डर आसानी से मिल जाते हैं। जो कार्यक्रम हो रहे हैं, उनमें ई-कार्ड से ही लोग काम चला रहे हैं। नवम्बर और दिसम्बर की शादियों को लेकर अभी ऑर्डर नहीं मिले हैं। लोग अभी असमंजस में हैं।

प्रिंटिंग प्रेस वाले भी मुश्किल में 

शहर में छोटे-बड़े 300 से अधिक प्रिंटिंग प्रेस वाले हैं। तमाम कार्ड वालों ने प्रिंटिंग प्रेस लगा रखा है लेकिन बड़ी संख्या में लोग इस धंधे पर निर्भर हैं। प्रिंटिंग प्रेस चलाने वाले अनिल सिंह का कहना है कि मजबूरी में पूरा ध्यान फ्लैक्स और होर्डिंग के कारोबार में लगाना पड़ रहा है। मोहद्दीपुर में प्रिंटिंग प्रेस चलाने वाले प्रमोद कहते हैं कि लाखों की लागत से खरीदी गई मशीनें जंग खा रही है।

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