दतियाः पंडोखर पीठाधीश्वर श्री गुरु शरण महाराज ने त्रिकालदर्शी दिव्या दरबार के आयोजन से पूर्व भक्तों के समक्ष उद्गार व्यक्त किए। महाराज ने कहा कि हमें अपनी संस्कृति को गीता, रामायण, हनुमान चालीसा आदि ग्रंथों को पढ़कर संस्कृति का संरक्षण करना होगा। जब संस्कृति का संरक्षण होगा तो हमारी आने वाली संतान भी सद्बुद्धि को प्राप्त होगी।
गुरु शरण महाराज ने कहा कि रामायण ग्रंथ के अनुसार वनवास अकेले राम जी को हुआ था लेकिन वन में लक्ष्मण एवं सीता माता भी गए। वन में उन्हें वानर सेना का सहयोग मिला वानर सेना में मौजूद नल नील द्वारा ऐसा जतन किया कि सागर में पत्थरों को भी तैरना पड़ा। इसी को हमारे यहां विज्ञान कहा गया है।
महाराज ने कहा कि वानर नल नील के पास ऐसी वैज्ञानिक कला थी कि उनके द्वारा सागर में छोड़े हुए पत्थर भी पानी पर तैरते और एक दूसरे से जुड़ते हुए पुल का निर्माण किया। उस समय में भी यह भाव आया कि नल नील रूपी वानर भी एक उस जमाने के इंजीनियर थे। अगर आप राम को मानते हैं तो विज्ञान को भी मानना ही पड़ेगा।
उन्होंने कहा कि हमारा प्रयास रहता है कि आपके अनसुने प्रश्नों का उत्तर देना। हम आपके सभी प्रश्नों का सटीकता से जवाब देते हैं। जब तक आपके मन में आस्था, श्रद्धा और विश्वास नहीं है तब तक आप किसी कार्य में सफल नहीं हो सकते।
पंडोखर धाम में लगने वाला त्रिकालदर्शी दिव्य दरबार श्रद्धा, आस्था एवं विश्वास का समागम है। पंडोखर धाम कोई झाड़फूंक, ओझा का स्थल नहीं है यह श्रद्धा एवं विश्वास का केंद्र है। त्रिकालदर्शी दिव्य दरबार में वैज्ञानिक भी नतमस्तक होते हैं और धाम दरबार विज्ञान के शोध कर्ताओं का सम्मान भी करता है। क्योंकि ऋषि महर्षि भी विज्ञान पद्धति से भी कार्य करते थे। यह दरबार किसी भी ज्ञान विज्ञान या पद्धति का विरोध नहीं करता है।
त्रिकालदर्शी दिव्य दरबार के दौरान पंडोखर पीठाधीश्वर श्री गुरु शरण जी महाराज ने अनेक प्रदेशों से आए भक्तों के परचे बनाकर उनकी समस्याओं को उजागर कर श्रद्धा मंच में मौजूद भक्तों को आश्चर्य चकित कर दिया। इस मौके पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु भक्त मौजूद रहे।
दतिया से संवाददाता विनोद कुशवाह की रिपोर्ट