मुंबई से निकलकर भारतीय सिनेमा के सबसे अलग पहचान रखने वाले कलाकारों में शामिल हुए नाना पाटेकर का सफर आसान नहीं था। उनका जन्म 1951 में महाराष्ट्र में विश्वनाथ पाटेकर के रूप में हुआ। फिल्मों में आने से पहले उन्होंने मराठी रंगमंच से अपने अभिनय करियर की शुरुआत की। यही रंगमंच उनके अभिनय की बुनियाद बना और आगे चलकर पर्दे पर उनके किरदारों में वही ठहराव, गहराई और तीव्रता दिखाई दी।
नाना पाटेकर ने 1978 में आई फिल्म ‘गमन’ से हिंदी सिनेमा में कदम रखा। शुरुआती दौर में उन्होंने समानांतर और गंभीर विषयों वाली फिल्मों में काम किया। उस दौर में उनकी अभिनय शैली ने उन्हें दूसरे कलाकारों से अलग पहचान दिलानी शुरू कर दी। वह केवल संवाद बोलने वाले अभिनेता नहीं थे, बल्कि चेहरे के भाव, आवाज के उतार-चढ़ाव और शरीर की भाषा से किरदार को जीवंत करने के लिए पहचाने गए।
80 के दशक में नाना पाटेकर ने ‘अंकुश’, ‘प्रतिघात’, ‘कल की आवाज’ और ‘प्रहार’ जैसी फिल्मों में काम किया। इन फिल्मों में उनके किरदारों ने यह स्थापित किया कि वह गंभीर और सामाजिक सरोकारों वाली भूमिकाओं को बेहद प्रभावशाली तरीके से निभा सकते हैं। 1989 में आई ‘परिंदा’ उनके करियर की महत्वपूर्ण फिल्मों में रही और इसके लिए उन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
‘परिंदा’ में उनके अभिनय ने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर बड़ी पहचान दिलाई। इसके बाद 1994 की ‘क्रांतिवीर’ में निभाया गया किरदार उनके करियर के सबसे यादगार प्रदर्शनों में शामिल हुआ। इस फिल्म के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला। नाना पाटेकर को उनके अभिनय के लिए कुल तीन राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिले।
नाना पाटेकर की खासियत यह थी कि वह किसी एक तरह की भूमिका में बंधकर नहीं रहे। ‘अग्निसाक्षी’ और ‘खामोशी: द म्यूजिकल’ जैसी फिल्मों में उन्होंने अपने अभिनय के अलग-अलग रंग दिखाए। गंभीर, भावनात्मक और जटिल किरदारों को पर्दे पर उतारने की उनकी क्षमता ने उन्हें निर्देशकों और दर्शकों दोनों के बीच अलग स्थान दिलाया।
2004 की फिल्म ‘अब तक छप्पन’ में नाना पाटेकर ने पुलिस अधिकारी का किरदार निभाया। फिल्म में उनकी संवाद अदायगी और नियंत्रित लेकिन प्रभावशाली अभिनय को खूब सराहा गया। यह भूमिका उनके उन किरदारों में रही, जिनमें उन्होंने बिना जरूरत के दिखावे के केवल अभिनय के दम पर स्क्रीन पर प्रभाव बनाया।
नाना पाटेकर की लोकप्रियता केवल गंभीर फिल्मों तक सीमित नहीं रही। 2007 में आई ‘वेलकम’ में उदय शेट्टी के किरदार ने उनकी कॉमिक टाइमिंग का ऐसा पक्ष सामने रखा, जिसे दर्शकों ने लंबे समय तक याद रखा। गंभीर और आक्रामक किरदारों के लिए मशहूर नाना ने कॉमेडी में भी अपनी अलग छाप छोड़ी।
नाना पाटेकर का रिश्ता सिर्फ हिंदी सिनेमा से नहीं था। उन्होंने मराठी फिल्मों में भी उल्लेखनीय काम किया। ‘नटसम्राट’ उनके करियर की बेहद महत्वपूर्ण मराठी फिल्मों में शामिल रही। इस फिल्म में एक रंगमंच के दिग्गज कलाकार के जीवन और भावनात्मक संघर्ष को उन्होंने बेहद गहराई से पर्दे पर पेश किया।

नाना पाटेकर ने अभिनय के अलावा फिल्म निर्देशन में भी काम किया। 1990 के दशक में उन्होंने ‘प्रहार: द फाइनल अटैक’ का निर्देशन किया। इस फिल्म में उन्होंने अभिनय भी किया था। इससे स्पष्ट था कि सिनेमा उनके लिए सिर्फ अभिनय तक सीमित नहीं था, बल्कि कहानी और फिल्म निर्माण की प्रक्रिया में भी उनकी गहरी रुचि थी।
नाना पाटेकर को भारतीय सिनेमा में उनके योगदान के लिए तीन राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिले। उन्हें 2013 में पद्मश्री से भी सम्मानित किया गया। राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति और प्रधानमंत्री समेत कई प्रमुख हस्तियों ने उनके निधन पर शोक व्यक्त किया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनके अभिनय की तीव्रता, अलग पहचान और बहुमुखी प्रतिभा को याद किया।
नाना पाटेकर ने उम्र बढ़ने के बावजूद अभिनय से दूरी नहीं बनाई। 2024 में ‘वनवास’, 2025 में ‘हाउसफुल 5’ और 2026 में ‘ओ’ रोमियो तथा ‘सुबेदार’ जैसे प्रोजेक्ट्स में उनकी मौजूदगी रही। यानी पांच दशक से ज्यादा लंबे करियर के आखिरी दौर में भी वह लगातार रचनात्मक रूप से सक्रिय रहे।
नाना पाटेकर की सबसे बड़ी पहचान उनकी आवाज और संवाद बोलने की विशिष्ट शैली रही। वह संवाद को केवल शब्दों के रूप में नहीं बोलते थे, बल्कि उसमें भावनाएं, गुस्सा, दर्द और किरदार की मानसिक स्थिति को शामिल कर देते थे। यही वजह है कि उनकी कई फिल्मों के संवाद आज भी दर्शकों की यादों में हैं।
नाना पाटेकर का करीब पांच दशक लंबा करियर इस बात का उदाहरण है कि एक अभिनेता बिना पारंपरिक नायक की छवि के भी दर्शकों के दिल में स्थायी जगह बना सकता है। उन्होंने खलनायक, पुलिस अधिकारी, सैनिक, सामाजिक संघर्ष से जूझते व्यक्ति, गंभीर नायक और हास्य किरदार—हर तरह की भूमिका को अपनी शैली में निभाया। उनके निधन के साथ हिंदी और मराठी सिनेमा के एक ऐसे अध्याय का अंत हुआ है, जिसमें अभिनय की चमक से ज्यादा किरदार की सच्चाई मायने रखती थी। नाना पाटेकर पर्दे पर जितने तीखे और प्रभावशाली दिखाई देते थे, उनकी सबसे बड़ी विरासत यही रहेगी कि उन्होंने अभिनय को अपनी आवाज, अपने अंदाज और अपनी अलग पहचान दी।