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बड़ी खबर: कोविड के दौरान भरा सरकारी खजाना, लोगों का हुआ खस्ताहाल…

By: RNI Hindi Desk 
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बड़ी खबर: कोविड के दौरान भरा सरकारी खजाना, लोगों का हुआ खस्ताहाल…

रिपोर्ट: सत्यम दुबे

नई दिल्ली: कोरोना महामारी के दौरान देश लगभग ठप हो गया था। कई महीना लोगो का लॉकडाउन में बीता जहां लगभग मध्यम वर्ग से लेकर निम्न वर्ग के लोगो का जीना कठिन हो गया था। इस दौरान लगभग हर प्रकार के कर संग्रह में कमीं देखने को मिली। लेकिन दूसरी तरफ उत्पादन शुल्क संग्रह में चालू वित्त वर्ष के दौरान 48 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है।

उत्पादन शुल्क संग्रह  में वृद्धि दर्ज होने का प्रमुख कारण डीजल और पेट्रोल पर उत्पाद शुल्क दर में रिकॉर्ड वृद्धि है। आपको बता दें कि महालेखा नियंत्रक से मिले आंकड़ों के अनुसार, अप्रैल-नवंबर 2020 के दौरान उत्पाद शुल्क का संग्रह 2019 की इसी अवधि के 1,32,899 करोड़ रुपये से बढ़कर 1,96,342 करोड़ रुपये हो गया।

इतना ही नहीं आपको जानकर आश्चर्य होगा कि उत्पाद शुल्क संग्रह में यह वृद्धि चालू वित्त वर्ष के आठ महीने की अवधि के दौरान डीजल की बिक्री में एक करोड़ टन से अधिक की कमी के बावजूद दर्ज हुई है।

लॉकडाउन के दौरान और पिछले कई महीनों से पेट्रोल और डीजल में आग लगी है। पेट्रोल और डीजल के दाम आसमान छू रहें हैं। इससे ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि आम आदमी की जेब पर भारी दबाव है। वास्तविकता यह है कि तेल की कीमत इतनी नहीं होती, बल्कि इसपर लोगो को भारी-भरकम टैक्स  चुकाना पड़ता है। जब आप एक लीटर तेल खरीदते हैं तो उसमें एक्साइज ड्यूटी डीलर कमीशन और वैल्यू ऐडेड टैक्स शामिल कर दिय़ा जाता हैं। इस तरह पेट्रोल या डीजल की असल कीमत यानी बेस प्राइस, एक्साइज ड्यूटी और वैल्यू ऐडेड टैक्स यानी वैट को जोड़कर एक लीटर तेल की खुदरा कीमत तय होती है।

आपको बता दें कि डीजल भारत में सबसे ज्यादा खपत होने वाला ईंधन है। पेट्रोलियम मंत्रालय के आंकड़ों को देखें तो, अप्रैल से नवंबर 2020 के दौरान डीजल की बिक्री साल भर पहले के 5.54 करोड़ टन से कम होकर 4.49 करोड़ टन रह गई। वहीं पेट्रोल की बात करें तो पेट्रोल की खपत भी साल भर पहले के 2.04 करोड़ टन से कम होकर 1.74 करोड़ टन रही। खास बात यह है कि पेट्रोलियम उत्पादों और प्राकृतिक गैस को माल एवं सेवा कर यानि जीएसटी से बाहर रखा गया है। जीएसटी व्य़वस्था साल 2017 में जुलाई महीनें में अमल की गई थी।

आपको बता दें कि पेट्रोलियम उत्पादों और प्राकृतिक गैस पर केंद्र सरकार उत्पाद शुल्क वसूलती है, जबकि राज्य सरकारें मूल्य वर्धित कर यानि वैट  लगाती हैं।

अब आप इसको इस तरह से समझ सकतें हैं कि आर्थिक क्षेत्र में सुस्ती के बावजूद उत्पाद शुल्क संग्रह में हुई वृद्धि का मुख्य कारण पेट्रोल और डीजल पर कर की दर में रिकॉर्ड वृद्धि का होना है। सरकार ने चालू वित्त वर्ष के दौरान पेट्रोल पर दो बार में उत्पाद शुल्क 13 रुपये प्रति लीटर और डीजल पर 16 रुपये प्रति लीटर बढ़ाया है। इससे पेट्रोल पर उत्पाद शुल्क बढ़कर 32.98 रुपये प्रति लीटर और डीजल पर 31.83 रुपये प्रति लीटर हो गया। महालेखा नियंत्रक के आंकड़ों के अनुसार 2019- 20 पूरे वित्त वर्ष में कुल उत्पाद शुल्क प्राप्ति 2,39,599 करोड़ रुपये रही है।

अगर इसको और भी आसान भाषा में समझें तो मान लो 1 जनवरी के दिन दिल्ली में डीजल की कर और उसकी कीमत 73.87 रुपये थी। अब इसमें कुल कीमत में डीजल का प्रति लीटर बेस प्राइस 28.32 रुपये, 0.34 रुपये प्रति लीटर फ्रेट चार्ज शामिल कर डीलर से एक लीटर डीजल के लिए 28.66 रुपये चार्ज किया जाता है। अब इसके बाद 31.83 रुपये एक्साइज चार्ज, 2.53 रुपये डीलर कमीशन और 10.85 रुपये VAT को शामिल किया जाता है और आखिर में एक लीटर डीजल की खुदरा कीमत 73.87 रुपये कस्टमर से ली गई। इसलिए सरकार पेट्रोल और डीजल के दामों में कमीं नहीं कर रही है।

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