रिपोर्ट: सत्यम दुबे
कोलकाता: पश्चिम बंगाल का चुनावी संग्राम अब थम गया है। बंगाल विधानसभा चुनाव में ‘खेला भी’ हो गया। भाजपा की सारी रणनीति धरी रह गई और ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस 213 सीटें जीतकर एक बार फिर बहुमत से सत्ता में वापसी कर ली। बंगाल की जीत को लेकर खीर में नमक आने से जैसी स्थिति उस वक्त बन गई, जब पता चला कि पार्टी जीत गई, लेकिन टीएमसी प्रमुख ममता बनर्जी नंदीग्राम विधानसभा सीट से चुनाव हार गईं। ममता बनर्जी के सामने उनके पूर्व सहयोगी और भाजपा प्रत्याशी सुवेंदु अधिकारी मैदान में थे। सुवेंदु अधिकारी ने 1957 वोटों से ममता बनर्जी को हरा दिया।ऐसे में सबके मन में यह सवाल है कि अब वे मुख्यमंत्री कैसे बनेंगी।
आइए आपको बताते हैं कि चुनाव हारने के बावजूद भी मुख्यमंत्री कैसे बना जा सकता है, क्या है इसका कानूनी तरीका
मुख्यमंत्री बनने के लिए यूं तो विधानसभा या विधान परिषद का सदस्य होना जरूरी है। अगर विधानसभा या विधान परिषद सदस्य नहीं है, तो शपथ लेने के छह माह के भीतर सदस्य बनना जरूरी होता है। नियमों के मुताबिक, मुख्यमंत्री पद की शपथ बिना विधायक रहते ली जा सकती है। इसके बाद मुख्यमंत्री को छह महीने का वक्त मिलता है। इस तय समय सीमा के अंदर उनका विधानसभा या विधान परिषद का सदस्य बनना अनिवार्य है। अगर ऐसा नहीं हुआ, तो मुख्यमंत्री पद छोड़ना पड़ेगा।
आपको बता दें कि ममता बनर्जी कड़े मुकाबले में सुवेंदु अधिकारी से 1957 वोटों से हार गई हैं। उन्होंने अपनी हार स्वीकार कर ली। लेकिन साथ ही आरोप लगाया कि पहले उन्हें जीता हुआ घोषित किया गया और बाद में दबाव में आकर चुनाव आयोग ने फैसला पलट दिया। बंगाल में टीएमसी की जीत के बाद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कहा कि नंदीग्राम के बारे में चिंता मत करो। नंदीग्राम के लोग जो भी जनादेश देंगे, मैं उसे स्वीकार करती हूं। मुझे कोई आपत्ति नहीं है। हमने 221 से अधिक सीटें जीतीं और भाजपा चुनाव हार गई। मैं जनादेश को स्वीकार करती हूं, लेकिन मैं न्यायालय जाऊंगी क्योंकि मुझे जानकारी है कि परिणामों की घोषणा के बाद कुछ हेरफेर की गई और मैं उसका खुलासा करूंगी।
आपको बता दें कि भारतीय जनता पार्टी ने प्रचार के दौरान 200 पार का नारा दिया था। लेकिन नतीजे में 200 सीटें पार तो हुई लेकिन ममता बनर्जी की पार्टी TMC ने किया। टीएमसी के चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने ममता बनर्जी को एक बार फिर बंगाल की राजगद्दी सौंपने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसी का परिणाम है कि बीजेपी के 200 पार का नारा केवल नारा ही रह गया।