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विकसित भारत का कृषि मॉडल: गौ-आधारित प्राकृतिक खेती और स्वस्थ जीवन

प्रधानमंत्री मोदी बार-बार यह रेखांकित करते रहे हैं कि भारत की अनेक समस्याओं का समाधान हमारी अपनी परंपराओं और स्वदेशी ज्ञान प्रणाली में निहित है। इसी विचार से प्राकृतिक खेती को राष्ट्रीय स्तर पर प्रोत्साहन मिल रहा है।

By: Abhinav Tiwari 
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विकसित भारत का कृषि मॉडल: गौ-आधारित प्राकृतिक खेती और स्वस्थ जीवन

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारत आज ऐसे विकास पथ पर अग्रसर है, जहाँ आर्थिक प्रगति के साथ पर्यावरण संरक्षण, सार्वजनिक स्वास्थ्य और सांस्कृतिक मूल्यों को समान महत्व दिया जा रहा है। इसी समग्र दृष्टिकोण के अंतर्गत भारतीय कृषि को भी एक नए युग की ओर ले जाने का प्रयास हो रहा है।

कृषि सदियों से हमारी सभ्यता की रीढ़ रही है, किंतु आधुनिक काल में रासायनिक उर्वरकों और सिंथेटिक कीटनाशकों पर अत्यधिक निर्भरता ने खेती की लागत बढ़ाने के साथ-साथ मिट्टी की उर्वरता, जलधारण क्षमता और दीर्घकालिक स्थिरता को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। इसका सीधा असर भोजन की गुणवत्ता और नागरिकों के स्वास्थ्य पर पड़ा है।

प्रधानमंत्री मोदी बार-बार यह रेखांकित करते रहे हैं कि भारत की अनेक समस्याओं का समाधान हमारी अपनी परंपराओं और स्वदेशी ज्ञान प्रणाली में निहित है। इसी विचार से प्राकृतिक खेती को राष्ट्रीय स्तर पर प्रोत्साहन मिल रहा है। आज आवश्यकता है कि कृषि को केवल उत्पादन के नजरिये से नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, स्थिरता और आत्मनिर्भरता के व्यापक संदर्भ में देखा जाए।

भारतीय कृषि परंपरा और गौमाता की केंद्रीय भूमिका

भारत की पारंपरिक कृषि व्यवस्था सह-अस्तित्व और संतुलन पर आधारित रही है, जिसमें गौमाता की भूमिका सदैव केंद्रीय रही है। गौ केवल धार्मिक प्रतीक नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था, कृषि उत्पादकता और पोषण सुरक्षा का मजबूत आधार रही हैं। हमारे पूर्वज भली-भांति जानते थे कि गौवंश का संरक्षण सीधे मिट्टी के स्वास्थ्य से जुड़ा है।

गोबर और गोमूत्र से भूमि को पोषण मिलता है, सूक्ष्म जीव सक्रिय होते हैं और मिट्टी पुनः जीवंत होती है। स्वस्थ मिट्टी से प्राप्त अन्न अधिक पौष्टिक, सुरक्षित और मानव शरीर के अनुकूल होता है।

प्राकृतिक खेती: कृषि तकनीक नहीं, जीवन पद्धति

प्रधानमंत्री मोदी की दृष्टि में प्राकृतिक खेती केवल एक कृषि तकनीक नहीं, बल्कि जीवन जीने की भारतीय पद्धति है। यह किसानों की लागत घटाने, आय बढ़ाने और उन्हें बाहरी निर्भरता से मुक्त करने का सशक्त माध्यम है। साथ ही, यह देशवासियों को रसायन-मुक्त और विषरहित भोजन उपलब्ध कराने का मार्ग भी प्रशस्त करती है। इसी कारण प्राकृतिक खेती को आत्मनिर्भर भारत और विकसित भारत के लक्ष्यों से जोड़ा गया है।

प्राकृतिक खेती की कार्यप्रणाली सरल, स्वदेशी और प्रभावशाली है। इसमें गौशालाओं को केवल संरक्षण केंद्र नहीं, बल्कि कृषि आदानों के उत्पादन के आर्थिक केंद्र के रूप में विकसित करने की आवश्यकता है।

गोबर और गोमूत्र से तैयार जीवामृत, बीजामृत और पंचगव्य जैसे प्राकृतिक इनपुट मिट्टी के सूक्ष्म जीवों को सक्रिय कर भूमि की उर्वरता को दीर्घकालिक रूप से बढ़ाते हैं। पलवार (मल्चिंग) जैसी तकनीकें मिट्टी की नमी बनाए रखती हैं, जल संरक्षण में सहायक होती हैं और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से फसलों की रक्षा करती हैं। इन उपायों से खेती की लागत में उल्लेखनीय कमी आती है, जिससे शून्य बजट प्राकृतिक खेती का लक्ष्य व्यवहारिक रूप से संभव बनता है।

सहकारिता से समृद्धि: संस्थागत शक्ति का आधार

प्राकृतिक खेती को जन-आंदोलन बनाने में केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह का मार्गदर्शन अत्यंत महत्वपूर्ण है। उनके विजन ‘सहकारिता से समृद्धि’ के अंतर्गत प्राकृतिक खेती करने वाले किसानों को संगठित किया जा रहा है और किसान उत्पादक संगठनों (FPOs) को सशक्त बनाया जा रहा है।

इससे छोटे किसानों को न केवल सस्ती दरों पर प्राकृतिक खाद और बीज उपलब्ध हो रहे हैं, बल्कि उनके विषमुक्त उत्पादों को उचित बाजार और लाभकारी मूल्य भी मिल रहा है। गौ-आधारित प्राकृतिक खेती और सहकारिता का यह समन्वय ही ग्रामीण समृद्धि का नया मार्ग प्रशस्त करता है।

स्वास्थ्य, योग और प्राकृतिक भोजन का समन्वय

प्राकृतिक खेती का महत्व केवल खेत तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा संबंध मानव स्वास्थ्य और जीवनशैली से है। आज जीवनशैली से जुड़ी बीमारियाँ तेजी से बढ़ रही हैं, जिनका एक बड़ा कारण रासायनिक अवशेषों से युक्त भोजन है। प्राकृतिक खेती से प्राप्त शुद्ध और विषमुक्त अन्न पाचन तंत्र को सुदृढ़ करता है, रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है और दीर्घकालिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाता है।

प्रधानमंत्री मोदी द्वारा योग और आयुष को वैश्विक पहचान दिलाना इसी समग्र स्वास्थ्य दृष्टि का हिस्सा है। योग, प्राणायाम और संतुलित दिनचर्या तभी पूर्ण लाभ देती है, जब भोजन भी शुद्ध और प्राकृतिक हो। प्राकृतिक खेती, स्वस्थ भोजन और योग-तीनों मिलकर स्वस्थ भारत की परिकल्पना को साकार करते हैं।

‘एक एकड़, एक मौसम’ से जन-आंदोलन की ओर

प्राकृतिक खेती को अपनाने के लिए प्रधानमंत्री मोदी का व्यावहारिक मंत्र-‘एक एकड़, एक मौसम’- किसानों के लिए प्रेरणास्रोत है। छोटे स्तर पर प्रयोग कर किसान बिना जोखिम उठाए परिणाम देख सकता है और फिर धीरे-धीरे इसका विस्तार कर सकता है।

केंद्र सरकार द्वारा संचालित राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन के अंतर्गत प्रशिक्षण, तकनीकी मार्गदर्शन, आदानों की उपलब्धता और बाजार से जोड़ने के लिए मजबूत संस्थागत समर्थन दिया जा रहा है। इसमें महिला किसानों की भूमिका भी उल्लेखनीय है, जो इस परिवर्तन की अग्रणी बन रही हैं।

गौ-आधारित प्राकृतिक खेती: भारतीय जीवनदृष्टि का पुनर्जागरण

इस संपूर्ण प्रयास में गौ-सेवा का स्थान केंद्रीय है। गौवंश का संरक्षण और संवर्धन केवल आस्था का विषय नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण, ग्रामीण रोजगार और सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़ा हुआ है। मध्यप्रदेश सरकार प्रधानमंत्री मोदी की इस दूरदर्शी सोच को धरातल पर उतारने के लिए पूरी प्रतिबद्धता के साथ कार्य कर रही है। हमारा लक्ष्य केवल उत्पादन बढ़ाना नहीं, बल्कि मिट्टी, किसान और उपभोक्ता-तीनों के स्वास्थ्य की रक्षा करना है।

गौ-आधारित प्राकृतिक खेती केवल कृषि सुधार की पहल नहीं, बल्कि भारतीय जीवनदृष्टि का पुनर्जागरण है। गौमाता और मिट्टी की रक्षा के अपने सांस्कृतिक दायित्व को निभाते हुए हम आने वाली पीढ़ियों के लिए स्वस्थ भोजन, संतुलित जीवनशैली और सुरक्षित भविष्य सुनिश्चित कर सकते हैं। यही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के विकसित, आत्मनिर्भर और स्वस्थ भारत के स्वप्न को साकार करने का सशक्त मार्ग है।

लेखक: राजेन्द्र शुक्ल, उप मुख्यमंत्री, मध्यप्रदेश

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