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दिल्ली विधानसभा 2020: किसके सर सजेगा दिल्ली का ताज?

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दिल्ली विधानसभा का चुनावी बिगुल बज चुका है। चुनाव आयोग ने तारीखों का ऐलान कर दिया है जिसके बाद तमाम राजनीतिक पार्टियों ने भी कमर कस ली है। लेकिन साल 2014 के मुकाबले राजधानी की चुनावी फिजा पूरी तरह बदली हुई है। लेकिन इस बार भी चुनावी मुकाबला त्रिकोणीय होने की उम्मीद है। आम आदमी पार्टी, कांग्रेस और बीजेपी के बीच इस बार भी मुकाबला होना तय है।

दिल्ली की सत्ता पर पिछले पांच सालों से आम आदमी पार्टी की सरकार है। लेकिन इसबार का चुनाव बिल्कुल अलग होने वाला है। 2014 में 5 साल केजरीवाल का नारा देकर पहली बार सत्ता में आई आम आदमी पार्टी ने दिल्ली की जनता को तमाम तरह के सपने दिखाए थे। अब केजरीवाल को जनता के सामने अपने उन तमाम वादों को लेकर जाना है और बताना है कि उन्होंने क्या किया है।

केजरीवाल ने दिल्ली की जनता से फ्री वाईफाई, सीसीटीवी, सस्ती बिजली, फ्री पानी, बसों में मार्शल, महिलाओं को बसों में फ्री सफर समेत तमाम वादे किये थे। अब उन्हें दिल्ली की जनता को यह बताना होगा कि उन्होने जितने भी वादे दिल्ली की जनता से किए थे उनमे कितने पूरे हुए। क्योंकि केजरीवाल अभी दिल्ली के मुख्यमंत्री हैं और इन सभी सवालों का जवाब उन्हें ही देना है। लेकिन इन चुनावों में आम आदमी पार्टी के पास एक चेहरा है जिसे लेकर वो जनता के बीच जाएगी और लोगों से एक बार फिर से सत्ता में वापसी के लिए वोट मांगेंगी।

दूसरी तरफ बीजेपी दिल्ली की सत्ता पर काबिज होने के लिए पिछले एक दशक से प्रयास कर रही है। लेकिन अबतक बीजेपी को इसमें सफलता नहीं मिली है। पिछली बार भी बीजेपी ने बूथ स्तर तक मेहनत की थी लेकिन कुछ सीटों से वह सत्ता से दूर रह गई। इसका अंदरूनी कारण दिल्ली बीजेपी में आपसी कलह था जिसके कारण बीजेपी को सत्ता नसीब नहीं हुई। दूसरा चुनाव से तुरंत पहले दिल्ली बीजेपी अध्यक्ष का बदला जाना भी बीजेपी को भारी पड़ गया था।

जिसके कारण कार्यकर्ताओं में भारी नाराजगी दिखी थी। लेकिन इस बार बीजेपी इस तरह के किसी भी कदम को उठाने से बचेगी। दिल्ली के लिए बीजेपी के पास कई चेहरे हैं जिन्हें सामने लाकर चुनाव लड़ा जा सकता है लेकिन किसी एक के नाम पर सहमती बनना मुश्किल है। यही कारण है कि बीजेपी किसी एक चेहरे को सामने लाकर चुनाव नहीं लड़ना चाहती है। कुल मिलाकर अगर कहें तो बीजेपी का सीएम फेस कौन होगा इस पर अभी बीजेपी ने पत्ते नहीं खोले हैं।    

वहीं कांग्रेस की अगर बात की जाए तो पिछले विधानसभा चुनावों के मुकाबले इस बार उनका वोट प्रतिशत बढ़ने की पूरी उम्मीद है। हलांकि इस बार उनके पास सर्वमान्य चेहरे के रूप में शीला दीक्षित नहीं है। कांग्रेस शीला दीक्षित की बदौलत ही 15 सालों तक दिल्ली की सत्ता पर राज किया था। शीला का मध्यमवर्गीय परिवारों और गरीबों के बीच गहरा प्रभाव था लेकिन इसके साथ-साथ इलीट वर्गों में भी शीला दीक्षित का दबदबा था जिसके कारण कांग्रेस लगातार तीन बार दिल्ली की सत्ता में लौटी थी।

लेकिन इस बार के चुनाव में कांग्रेस को शीला दीक्षित के जैसा कोई चेहरा नहीं है जिसपर पार्टी में आमराय बनाई जा सके और जनता से यह कहे की पार्टी अगर जीतती है तो उनका मुख्यमंत्री ये होंगे। दूसरी तरफ पार्टी में गुटबाजी है वो अलग है। कांग्रेस के पास भी कोई एक चेहरे को लेकर विधानसभा चुनाव में जाना टेढ़ी खीर के जैसा है।

इन चुनावों में नागरिकता संशोधन कानून भी अपना गुल खिलाएगी। क्योंकि यह मुद्दा अभी गर्म है, केजरीवाल CAA के खिलाफ सीधे तौर पर कुछ भी नहीं बोल रहे हैं, इस मामले पर पार्टी फूंक-फूंककर कदम रख रही है। पार्टी को ऐसा लगता है कि इस मुद्दे पर ध्रुवीकरण हो सकता है। यही कारण है कि आम आदमी पार्टी विकास के कामों को हर सप्ताह आगे बढ़ा रही है जबकि बीजेपी CAA को लेकर आम आदमी पार्टी और कांग्रेस को जमकर ललकार रही है। ऐसे में यह भी एक सवाल है कि क्या CAA का मुद्दा वोटों का ध्रुवीकरण कराने में कामयाब रहेगा।

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