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माल्या और नीरव जैसे डिफॉल्टर्स की और बढ़ेगी मुसीबत, भरना होगा जब्त संपत्ति पर भी टैक्स

By Amit ranjan 
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नई दिल्ली : आने वाले समयों में विजय माल्या और नीरव मोदी जैसे बड़े डिफॉल्टर्स की और मुसीबत बढ़ने वाली है, जिसे लेकर उनपर अतिरिक्त बोझ पड़ेगा। गौरतलब है कि बैंकों ने अपना बकाया वसूलने के लिए उनकी संपत्ति, शेयर, पेंटिंग्स और दूसरे एसेट्स को बेचना शुरू कर दिया है, जिस पर लगे टैक्स का भुगतान उन्हें खुद करना पड़ेगा।

मौजूदा नियमों के मुताबिक एसेट सेल पर लगने वाले इनकम टैक्स या किसी दूसरे टैक्स का भुगतान डिफॉल्टर्स को करना होता है। अपना बकाया वसूलने के लिए जब्त की गई संपत्ति को बेचने वाले बैंकों की इसमें कोई देनदारी नहीं बनती है। KPB & Associates में पार्टनर पारस सावला ने कहा कि गिरवी रखी गई किसी भी एसेट पर प्रमोटर का हक होता है और इसे बेचने पर टैक्स चुकाने की देनदारी भी उसी की बनती है। न केवल कानून में यह बात साफ की गई है बल्कि इस पर सुप्रीम कोर्ट का एक फैसला भी है।

संपत्ति बेचने की अनुमति

जून में एक स्पेशल पीएमएलए कोर्ट ने बैंकों को डिफॉल्टर्स की 5,646 करोड़ रुपये की संपत्ति बेचने की अनुमति दी थी। इनमें कई बंगले और कुछ शेयर शामिल हैं। जब रियल एस्टेट की बिक्री होती है तो उस पर कैपिटल गेन टैक्स लगता है। इसी तरह शेयरों की बिक्री पर शॉर्ट टर्म या लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन टैक्स लगता है। सामान्य स्थिति में सेलर को ये टैक्स देने पड़ते हैं। टैक्स जानकारों का कहना है कि उन मामलों में एसेट्स की बिक्री के बीच में चीजें स्पष्ट हो सकती हैं जिनमें डिफॉल्टर फरार है या भारत में नहीं रह रहा है।

टैक्स एडवाइजरी फर्म Transaction Square के फाउंडर गिरीश वनवारी ने कहा कि यह साफ है कि टैक्स डिफॉल्टर्स को देना है लैंडर्स को नहीं। समस्या तब खड़ी होती है जब प्रमोटर्स या प्रॉपर्टी का मालिक भारत में नहीं है। उन्होंने कहा कि नॉन-रेजिडेंट के लिए टैक्सेशन के नियम अलग हैं और कई मामलों में संभावित खरीदार टैक्स के बारे में लैंडर्स से क्लेयरिटी चाहता है। कुछ मामलों में खरीदार को सरकार को सीधे टैक्स देना पड़ता है या विदहोल्ड टैक्स का मामला बनता है।

डिफॉल्टर्स को नोटिस

सूत्रों के मुताबिक इनकम टैक्स विभाग ने इस बारे में जांच शुरू कर दी है और जल्दी ही कुछ ऐसे डिफॉल्टर्स को नोटिस मिलने शुरू हो जाएंगे जिनकी एसेट्स बेची जा चुकी है। एक सूत्र ने कहा कि कुछ मामलों में बैंकों ने गिरवी रखे शेयर बेच दिए हैं। इस पर टैक्स चुकाने की जिम्मेदारी शेयरों के मालिक की है। लैंडर या किसी मिडलमैन की कोई देनदारी नहीं बनती है। जिन बैंकों ने प्रमोटर्स से पर्सनल गारंटी ली थी वे अब अपना पैसा वसूलने करने के लिए उन की पर्सनल प्रॉपर्टीज के पीछे पड़े हैं।

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