मध्य प्रदेश के टीकमगढ़ में एक मामले की सुनवाई के दौरान विशेष न्यायालय (एट्रोसिटीज) ने पुलिस द्वारा लगाई गई कुछ गंभीर धाराओं को निराधार मानते हुए हटा दिया है। न्यायालय ने माना कि फोन पर हुई बातचीत और मैसेज के विवाद को आधार बनाकर लगाई गई कुछ धाराओं के लिए प्रथम दृष्टया आवश्यक तथ्य मौजूद नहीं थे। मामले में अभियुक्त की ओर से अधिवक्ता अविरल जैन ने पक्ष रखा और पुलिस की कार्रवाई को चुनौती देते हुए न्यायालय में उन्मोचन (Discharge) आवेदन प्रस्तुत किया।
यह मामला वर्ष 2024 का है। जानकारी के अनुसार, एसडीओपी टीकमगढ़ कार्यालय में पदस्थ प्रधान आरक्षक जितेंद्र कुमार हेडले की शिकायत पर कोतवाली पुलिस ने आरोपी के खिलाफ एफआईआर क्रमांक 554/2024 दर्ज की थी। पुलिस ने आरोप लगाया था कि शिकायत से संबंधित जानकारी लेने के दौरान आरोपी ने फोन पर कथित रूप से जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल किया, शासकीय कार्य में बाधा पहुंचाई और धमकी दी। इसके बाद पुलिस ने विभिन्न धाराओं में मामला दर्ज कर जांच पूरी करते हुए न्यायालय में आरोप पत्र पेश किया था।
सुनवाई के दौरान अभियुक्त के अधिवक्ता अविरल जैन ने दलील दी कि पुलिस द्वारा लगाई गई कुछ धाराएं मामले के तथ्यों से मेल नहीं खाती हैं। विशेष न्यायाधीश अशरफ अली के न्यायालय ने केस डायरी और उपलब्ध दस्तावेजों का परीक्षण करने के बाद कई धाराओं को हटाने का आदेश दिया।
न्यायालय ने कहा कि भारतीय दंड संहिता की धारा 353 तभी लागू होती है, जब किसी लोक सेवक पर हमला या आपराधिक बल का प्रयोग किया गया हो। केवल फोन पर बातचीत, बहस या जानकारी मांगने को हमला नहीं माना जा सकता। इसी आधार पर धारा 353 को मामले से हटाया गया।

न्यायालय ने धारा 294 के संबंध में कहा कि दो व्यक्तियों के बीच निजी फोन बातचीत को सार्वजनिक स्थान पर किया गया कृत्य नहीं माना जा सकता। इसी तरह SC/ST एक्ट की धारा 3(1)(ध) के लिए सार्वजनिक रूप से अपमानित किए जाने का तत्व आवश्यक होता है, जो इस मामले में प्रथम दृष्टया नहीं पाया गया। कोर्ट ने इन धाराओं को निराधार मानते हुए अभियुक्त को इन आरोपों से मुक्त कर दिया।
न्यायालय ने धारा 294, 353 IPC और SC/ST एक्ट की धारा 3(1)(ध) के आरोपों से अभियुक्त को उन्मोचित कर दिया है। हालांकि, कथित धमकी और मैसेज से जुड़े आरोपों को देखते हुए मामला अब धारा 506 IPC, SC/ST एक्ट की धारा 3(2)(va) और आईटी एक्ट की धारा 67 के तहत आगे चलेगा।
कोर्ट के इस आदेश के बाद पुलिस की जांच प्रक्रिया और गंभीर धाराओं के इस्तेमाल को लेकर कानूनी क्षेत्र में चर्चा शुरू हो गई है। आरोप लगाया जा रहा है कि मामले में कुछ धाराएं बिना पर्याप्त तथ्यों के जोड़ी गई थीं। वहीं, अभियुक्त पक्ष ने जांच अधिकारी और शिकायतकर्ता के खिलाफ आगे कानूनी कार्रवाई की बात कही है।