शनि को वैदिक ज्योतिष में पाप ग्रह की संज्ञा दी गयी है वही इन्हे न्याय प्रिय ग्रह भी माना गया है, कहा जाता है कि शनि मनुष्य को उनके कर्म के अनुसार फल देते है, शनि की दृष्टि के बारे में कहा जाता है कि शनि की दृष्टि जिस भी भाव पर जाती है उस भाव संबंधी कारकों में वो कमी कर देता है और यही कारण है कि आम लोग तो क्या देवता भी शनि की दृष्टि से घबराते है।
फलित में शनि का एक नियम है कि शनि जिस भाव में बैठता है उस भाव की वृद्धि करता है और अपनी तीसरी, सातवीं और दसवीं दृष्टि से जिसे देखता है उसे हानि करता है।
एक समय की बात है, भगवान राम के पिता राजा दशरथ का अयोध्या में राज था और उनकी प्रजा बेहद सुखी और प्रसन्न थी। हर और सुख – शांति थी और लोग अपना जीवन यापन कर रहे थे लेकिन एक दिन अचानक कुछ ज्योतिषी राजा से मिलने आये, उन्होंने दशरथ को कहा की शनि अब कृतिका नक्षत्र के अंतिम चरण में है और रोहिणी नक्षत्र में जाने वाला है।
आगे उन्होंने राजा से कहा की अगर ऐसा हुआ तो राज्य में अकाल पड़ेगा क्यूंकि शनि का रोहिणी नक्षत्र में प्रवेश ” रोहिणी शकट भेदन ” कहलाता है और आम मनुष्य तो क्या खुद देवता और दानव भी इस शकट भेदन से घबराते है, लेकिन दशरथ तो अपनी प्रजा से बेहद प्रेम करते थे और जब उन्हें लगा की उनकी प्रजा कहीं दुःखी ना हो जाए तो उन्होंने अपने गुरु वसिष्ठ से इसका उपाय बताने का आग्रह किया।
जब दशरथ के गुरु वसिष्ठ ने उनका प्रश्न सुना तो उन्होंने जवाब दिया की राजन, शनि जब भी रोहिणी का भेदन करता है अकाल पड़ता ही है, शनि के कोप से तो ब्रह्मा भी किसी को नहीं बचा सकते है और जब उन्होंने यह सुना तो राजा खुद ही अपने रथ पर बैठकर चन्द्रमा से भी 3 लाख योजन ऊपर नक्षत्र मण्डल में गए।
वह रथ दिव्य प्रतीत हो रहा था और राजा ने रोहिणी नक्षत्र के पीछे आकर रथ को रोक दिया और शनि का इंतज़ार करने लगे, उन्होनें सोचा की अगर युद्ध करना पड़े तो भी ठीक लेकिन शनि को शकट भेदन नहीं करने देना है। राजा दशरथ उस समय आकाश में दूसरे सूर्य की तरह चमक रहे थे और उनके मुख मंडल पर एक अलग ही तेज प्रकट हो रहा था।
जैसे ही शनि ने कृतिका नक्षत्र के अंतिम चरण को पूर्ण कर रोहिणी में आगे को उद्धत हुए तभी उन्होंने सामने युद्ध के लिए तैयार राजा दशरथ को देखा। उनको देखकर शनि बेहद हैरान हुए और कारण जानकर राजा से कहा की हे राजन, मेरे कोप से मनुष्य तो देवता और दानव भी घबराते है लेकिन आप जैसा पुरुषार्थ तो मैंने कहीं नहीं देखा।
ऐसा कहकर शनि देव राजा से बेहद प्रसन्न हुए और उन्होंने उनसे वर मांगने को कह दिया जिसके बाद राजा ने शनि की स्तुति की और उनसे आग्रह किया की जब तक नदियां, सागर, चन्द्रमा, सूर्य और पृथ्वी इस संसार में है, तब तक आप रोहिणी शकट भेदन बिलकुल न करें।
जैसे ही शनि ने राजा को आश्वस्त किया की वो अब रोहिणी शकट भेदन नहीं करेंगे तो राजा दशरथ भी अपने को धन्य समझ कर वापस जाने लगे। तभी शनि देव ने रोक कर कहा कि वे उनसे बहुत ही प्रसन्न हैं इसलिए वे एक और वर भी मांग सकते हैं।
तब दशरथ ने प्रसन्न होकर शनि से दूसरा वर मांगा, और शनि ने उन्हें निर्भय करते हुए आश्वस्त किया कि 12वर्ष तक उनके राज्य में कोई भी अकाल नहीं पड़ेगा, उनकी यश-कीर्ति तीनों लोकों में फैलेगी और शनि के इसी वरदान के कारण तीनों लोकों में राजा दशरथ की लोकप्रियता फैली।