श्रावण के माह में भगवान् शिव की पूजा के साथ साथ गणेश जी की पूजा करने का भी विधान है। माना जाता है कि भगवान गणेश विघ्न हर्ता है और कोई भी नया काम शुरू करने से पहले एक बार उनका स्मरण करना चाहिए।
भगवान गणेश का स्मरण करने के बाद जो भी काम शुरू किया जाता है उस कार्य में सफलता मिलती है। वहीं गणेश को गणपति भी कहा जाता है।
शिव जी को यक्ष स्वरूप कहा गया है यक्षस्वरूप का मतलब होता है दिव्य स्वरूप। शिव जी के गण हमेशा उनके पास अतरंग स्वरुप में रहते हैं, वे शिव के मित्र भी हैं और रक्षक भी इन्हें विकृत स्वरुप माना गया है।
वहीं गणेश जी को गणपति का दर्जा मिला है यानी गणो के स्वामी। दरअसल जब माता पार्वती स्नान कर रही थी तब उन्होंने गणेश को पहरा देने को कहा।
जब शिव ने अंदर जाने की जिद की तो उन्हें भी गणेश जी ने नहीं जाने दिया। इसके बाद शिव ने उसका सिर धड़ से अलग कर दिया।
माता पार्वती के क्रोधित होने पर उन्हें गज का सिर लगाया गया था लेकिन उन्हें गजपति की बजाय गणपति इसलिए कहा गया क्यूंकि वो हाथी भी शिव का गण ही था।
यही कारण है कि गणेश जी को गणपति कहा जाता है।