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अपने अधिकारों के लिए आर-पार की लड़ाई लड़ेगा कालबेलिया समाज, एकजुटता के लिए करेगा संघर्ष

आज भी कालबेलिया समाज के अधिकांश लोग शिक्षा, रोजगार और मूलभूत सुविधाओं से वंचित हैं। बहरहाल इस आयोजन के जरिए समाज ने साफ कर दिया है कि अब वे अपने अधिकारों के लिए एकजुट होंगे।

By: Naredra 
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अपने अधिकारों के लिए आर-पार की लड़ाई लड़ेगा कालबेलिया समाज, एकजुटता के लिए करेगा संघर्ष

सीहोर जिले के काकरखड़ा माता मंदिर धाम में आज सपेरा यानी कालबेलिया समाज की भारी संख्या में एकजुटता देखने को मिला। सदियों पुरानी परंपराओं को बचाने और अपने अधिकारों को हासिल करने के लिए समाज अब खुलकर मैदान में उतर आया है। भव्य आयोजन, शोभायात्रा, धार्मिक आस्था और सामाजिक चेतना के इस संगम ने एक बड़ा संदेश दिया है, कि अब कालबेलिया समाज अपनी पहचान और हक के लिए निर्णायक लड़ाई लड़ने को तैयार है।

कालापीपल में निकाली गई शोभा यात्रा के बाद भोलेनाथ मंदिर धाम आज एक अलग ही रंग में नजर आया। चारों ओर उत्साह, उमंग और आस्था का माहौल था। कालबेलिया समाज के लोग अपनी पारंपरिक वेशभूषा में सजे-धजे, हाथों में ढोल और बाजे लेकर पूरे नगर में निकले। शोभायात्रा के दौरान “भोलेनाथ के जयकारे” और “बाबा गुरु कानिफनाथ की जय” से पूरा वातावरण गूंज उठा।

महिलाएं पारंपरिक पोशाक में लोकनृत्य करती नजर आईं, वहीं युवा वर्ग भी पूरे जोश के साथ इस आयोजन में शामिल हुआ। यह दृश्य न सिर्फ सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक था, बल्कि समाज की एकजुटता और अपनी जड़ों से जुड़े रहने की भावना को भी दर्शा रहा था।

माता मंदिर परिसर में आयोजित बैठक में समाज के लोगों ने गंभीरता से अपने मुद्दों पर चर्चा की। इस दौरान संगठन को मजबूत करने के उद्देश्य से कई महत्वपूर्ण घोषणाएं की गई। समाज के महासचिव राकेश ने मंच से विभिन्न पदों की घोषणा करते हुए कई लोगों को जिम्मेदारियां सौंपी।

बता दें कि कालबेलिया समाज की पहचान सदियों से उनकी पारंपरिक जीवनशैली और नाग देवता से जुड़े कार्यों से रही है। नाग पंचमी जैसे पर्व पर यह समाज घर-घर जाकर नाग देवता की पूजा करवाता था। बदले में लोगों से कपड़े, अनाज और अन्य सामग्री प्राप्त होती थी। यही उनकी आजीविका का प्रमुख साधन था। लेकिन बदलते समय और सरकारी नियमों के चलते अब इन परंपराओं पर रोक लग गई है। समाज के लोगों का कहना है कि उनकी पहचान और जीवन का आधार ही उनसे छिनता जा रहा है।

कार्यक्रम में वक्ताओं ने सरकार की नीतियों और वादों पर भी सवाल उठाए… बताया गया कि वर्ष 2016 में कालबेलिया समाज को घुमंतू एवं घुमक्कड़ जाति के रूप में पहचान देने की घोषणा की गई थी। इसके अलावा 10 प्रतिशत आरक्षण की बात भी कही गई। लेकिन जमीनी स्तर पर समाज को इसका कोई खास लाभ नहीं मिल पाया है। आज भी समाज के अधिकांश लोग शिक्षा, रोजगार और मूलभूत सुविधाओं से वंचित हैं। इस आयोजन के जरिए समाज ने साफ कर दिया है कि अब वे बिखरे नहीं रहेंगे। बल्कि एकजुट होकर अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करेंगे।

 

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