महाभारत में एक प्रसंग है कि जब युद्ध को रोकने के लिए श्री कृष्ण हस्तिनापुर गए थे तो उन्होंने दुर्योधन को बहुत समझाया कि वह ये युद्ध न करे।
लेकिन उसके बाद भी वह नहीं माना। इसके बाद चूंकि कृष्ण दूत बनकर आये थे तो दुर्योधन ने उनको अपने महल में खाने के लिए आमंत्रित किया।
इसके बाद श्रीकृष्ण ने दुर्योधन के आमंत्रण को स्वीकार नहीं किया। इसका कारण पूछने पर उन्होंने उत्तर दिया की भोजन तो प्रेम पूर्वक कराया जाता है।
जिसके मन में कोई पाप नहीं हो उसका अतिथि बना जाता है। इसके बाद भगवान श्री कृष्ण विदुर की कुटिया में गए।
सादा भोजन खाया और रात भी उनके घर पर ही बिताई। इससे हमें यह सीखने को मिलता है कि प्रेम से कोई सादा भोजन भी खिलाये तो खाइये लेकिन मन में पाप हो तो उसके व्यंजन भी किसी काम के नहीं होते।