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शबरी जयंती: जानिये नवधा भक्ति का रहस्य जो राम ने शबरी को दी थी

By: RNI Hindi Desk 
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शबरी जयंती: जानिये नवधा भक्ति का रहस्य जो राम ने शबरी को दी थी

इस देश में शायद ही कोई ऐसा घर हो जहां रामचरितमानस का पाठ नहीं होता है, भगवान राम और माता सीता के आचरण और मर्यादा की पवित्रता से रामायण परिपूर्ण है और घर घर गायी जाती हैं, इसी मानस के अरण्य काण्ड में जिक्र है की भगवान राम ने वनवास के दौरान शबरी के झूठे बेर खाये थे और उन्हें भक्ति प्रदान की थी।

24 फरवरी को उन्ही मां शबरी की जयंती है तो आइये आज इस लेख में हम जानते है उनके जीवन और उनके चरित्र के बारे में और साथ ही जानेगे की नवधा भक्ति क्या है ? दरअसल शबरी जाति से भील यानी वनवासी थी और उनका असली नाम श्रमणा था, कहते है कि विवाह के तुरंत बाद ही वो दंडकारण्य वन में मतंग ऋषि के पास आ गयी थी।

वो आश्रम में उनकी खूब सेवा करती, उनके मन में वही ज्ञान और वैराग्य पैदा हो गया था, आपको यह भी शायद पता नहीं हो कि मातंगी देवी स्वयं मतंग ऋषि की पुत्री के रूप में पैदा हुई थी. मतंग ऋषि के आश्रम में ही शबरी ने उनकी सेवा करते हुए जीवन जिया था। कथाओं में जिक्र है कि एक बार मतंग मुनि ने शबरी से कहा कि एक दिन स्वयं भगवान विष्णु अवतार लेकर राम और लक्ष्मण के रूप में तुमसे मिलने आएंगे और तुम उनको रास्ता दिखाना।

कालांतर में शबरी उनका इंतज़ार करते करते बूढ़ी हो गयी पर उसने उम्मीद नहीं छोड़ी, प्रभु की लीला हुई और अरण्य काण्ड में सीता जी का अपहरण हो गया। उसे ढूढंते -2 प्रभु जटायु से मिले और बाद में उन्हें कबंध मिला, इस कांड के अंत में उनकी भेंट शबरी से होती है। दो राजकुमारों को आता देख वह समझ गयी की गुरु वचन सत्य हो गया है।

राम को देखकर तो शबरी की ख़ुशी का ठिकाना ही नहीं रहा, वह प्रेम से बावली हो गयी और राम जी को चख चख कर बेर खिलाती की कहीं खट्टे बेर उनके प्रभु ना खा ले, यही भक्ति भाव उसकी मुक्ति का कारण बना और शबरी ने राम जी की मदद करने के बाद परम् धाम प्राप्त किया।

शबरी ने कहा की प्रभु आप तो समस्त कारणों के कारण है और अपने भक्तों को मान देने के लिए उनसे रास्ता पूछ रहे है, फिर भी मैं आपकी मदद करती हूं, हे राम पंपा सरोवर पर सुग्रीव रहता है, वो अपने भाई से डरकर इस पर्वत पर रहता है और वही आपकी मदद करेगा।

इसके बाद राम जी ने उसे नवधा भक्ति का दान दिया जिसका गोस्वामी जी ने मानस में बड़ा सूंदर जिक्र किया है, तुलसीदास जी लिखते है कि।

नवधा भगति कहउँ तोहि पाहीं।
सावधान सुनु धरु मन माहीं॥
प्रथम भगति संतन्ह कर संगा।
दूसरि रति मम कथा प्रसंगा॥

गुर पद पंकज सेवा
तीसरि भगति अमान।
चौथि भगति मम गुन गन
करइ कपट तजि गान॥3

मंत्र जाप मम दृढ़ बिस्वासा।
पंचम भजन सो बेद प्रकासा॥
छठ दम सील बिरति बहु करमा।
निरत निरंतर सज्जन धरमा॥

सातवँ सम मोहि मय जग देखा।
मोतें संत अधिक करि लेखा॥
आठवँ जथालाभ संतोषा।
सपनेहुँ नहिं देखइ परदोषा॥

नवम सरल सब सन छलहीना।
मम भरोस हियँ हरष न दीना॥
नव महुँ एकउ जिन्ह कें होई।
नारि पुरुष सचराचर कोई

इसका सार यह है कि संतो का संग, कथा श्रवण, गुरु की सेवा, प्रभु की कथाओं का गान, मन्त्र में विश्वास, अच्छा चरित्र, संतो का आदर, सबको एक देखना, किसी का दोष नहीं देखना, सरल होना और हर स्थिति में प्रसन्न रहना ये मेरी भक्ति है और जो इन्हे प्राप्त करता है मैं उसी का हो जाता हूँ.

ऐसा कहकर राम ने शबरी को परम् धाम दे दिया और वो आगे बढ़े, इसके बाद किष्किंधा काण्ड की शुरुआत में हनुमान के माध्यम से उनकी मुलाकात सुग्रीव से होती है। शबरी भक्ति करने वालो के लिए एक ऐसा उदाहरण है जिनसे बहुत कुछ सीखा जा सकता है।

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