इस देश में घर घर में रामचरित मानस का पाठ किया जाता है, और जब बात मानस की होती है तो बात होती है राम की मर्यादा और सीता के चरित्र की, माता सीता एक आदर्श बेटी, पत्नी और बहू थी, राम ने माता कैकयी की बात रखने के लिए वनवास ग्रहण किया वही सीता ने भी उनकी पत्नी होने के नाते वन में जाना स्वीकार किया।
माता सीता इस देश में पूजी जाती है और हर साल फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को सीता जयंती मनाई जाती है, इस दिन यह तिथि कल यानी रविवार को पड़ रही है। इस दिन हर सुहागन माता सीता की पूजा कर उनसे यही आशीर्वाद मांगती है की जिस निति और मर्यादा से उन्होंने सदैव राम का मान रखा ठीक उसी प्रकार वो भी अपने पति के मान सम्मान की रक्षा कर सके।
मिथिला में एक बार भयानक अकाल पड़ा। इसे दूर करने के लिए एक यज्ञ का आयोजन किया जा रहा था। यज्ञ अनुष्ठान के लिए राजा जनक खेत में हल चला रहे थे। तभी एक कन्या उत्पन्न हुईं। राजा जनक ने उनको गोद में उठा लिया। मैथिली भाषा में हल को सीता कहते हैं, इसलिए जनक जी ने उनका नाम सीता रख दिया। जनक पुत्री होने के कारण सीता को जानकी, जनकात्मजा और जनकसुता कहा जाता है। मिथिला की राजकुमारी होने से उनको मैथिली भी कहा जाता है।
सीता जयंती का व्रत करने से वैवाहिक जीवन के कष्टों का नाश होता है। जीवनसाथी दीर्घायु होता है। इस व्रत को करने से समस्त तीर्थों के दर्शन का लाभ प्राप्त होता है। माना जाता है कि किसी महिला को अगर अपनी गृहस्थी में दिक्क्त आ रही हो तो उसे इस दिन माता जानकी की पूजा करनी चाहिए और उनसे निवेदन करना चाहिए की वो उन्हें संयम प्रदान करे।
माता सीता जी को पीले फूल, कपड़े और श्रृंगार का सामान अर्पित करें। अक्षत्, रोली, चंदन, धूप, गंध, मिठाई आदि अर्पित करें। इसके पश्चात श्री सीता-रामाय नमः या श्री सीतायै नमः मंत्र का जाप करें।